Wednesday, December 26, 2012
झूठ पर झूठ आखिर क्यों?
दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल सुभाष चंद तोमर की मौत की असल वजह क्या थी? मौत की वजह पर उलझन बढ़ती ही जा रही है। यह उलझन दिल्ली पुलिस की झूठ पर झूठ बोलने की वजह से और बढ़ी है। इस बीच चश्मदीद महिला पाउलिन ने यह कहकर मामले को और उलझा दिया है कि पुलिस झूठ कह रही है। दरअसल सुभाष के आस-पास भीड़ थी ही नहीं तो भीड़ द्वारा उन्हें पीटे जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस सुभाष की मौत के बहाने गैंगरेप के मामले को दबाना चाहती है। वहीं अब दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने खुद अपने साथी की मौत की जांच करने का फैसला किया है। इस मामले में आठ लोगों पर केस दर्ज कर लिया गया है। इनमें अरविंद केजरीवाल की 'आप' पार्टी का एक कार्यकर्ता भी शामिल हैं। वहीं अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी के किसी भी कार्यकर्ता के शामिल होने की बात से इंकार करते हुए उल्टा दिल्ली पुलिस की जांच पर ही सवाल उठा दिए। इंडिया गेट के समीप रविवार को ड्यूटी के दौरान मारे गए सिपाही सुभाष चंद तोमर को घटना के वक्त सहारा देने वाले युवक योगेंद्र के मुताबिक सिपाही की मौत प्रदर्शनकारियों के हमले से नहीं बल्कि भीड़ के पीछे भागने के दौरान हुई थी। प्रदर्शनकारियों के पीछे भागते वक्त वे थोड़ी देर के लिए रुके थे बाद में सड़क पर गिर पड़े थे। इसके बाद सुभाष को योगेंद्र, एक युवती व पुलिसकर्मियों ने सहारा भी दिया था। उन लोगों ने सुभाष के जूते खोले, हथेली रगड़ी तथा उनके सीने को दबाकर सांस देने की कोशिश की थी। वहीं पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने मंगलवार को सिपाही की मौत का कारण प्रदर्शनकारियों का उन पर हमला करना बताया था। उन्होंने दावा किया था कि सिपाही के शरीर पर कई गंभीर चोट के निशान थे। वहीं राम मनोहर लोहिया अस्पताल, जहां सिपाही की मौत हुई, वहां के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. टीएस सिद्धू कहते हैं, सदमे के चलते सिपाही को हार्ट अटैक आया था। उसके शरीर पर कहीं भी गंभीर चोट के निशान नहीं थे।
Tuesday, December 25, 2012
टी-20 में पाक से भारत की पहली हार
भारतीय और पाकिस्तान के बीच बैंगलोर के चेन्नास्वामी स्टेडियम में खेला गया पहला टी-20 मैच में भारत को 5 विकेट से शिकस्त मिली है। पाकिस्तान के कप्तान हफीज ने शानदार 61 रनों की पारी खेली। दो मैचों की सीरीज में पाकिस्तान 1-0 से आगे।इससे पहले पाकिस्तान ने टॉस जीतकर गेंदबाजी करने का फैसला किया। पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने निर्धारित 20 ओवरों में 9 विकेट खोकर 133 रन बनाए। रहाणे ने 42 रन और गंभीर ने 43 रन बनाए। इससे पहले दोनों टीमें 3 बार टी-20 में आमने-सामने हुई थी और तीनों में भारत विजयी रहा था।टीम इंडिया के लिए आज बल्लेबाजी बड़ी परेशानी की वजह रही। रहाणे और गंभीर को छोड़कर कोई बल्लेबाज नहीं चले। जबकि पहली बार टीम इंडिया में शामिल भूवनेश्वर कुमार ने 3 विकेट झटके। भुवनेश्वर कुमार ने तीन पाकिस्तानी बल्लेबाजों को पविलियन भेजकर विरोधी टीम को शुरूआती झटके दिए लेकिन शोएब मलिक ने नॉट आउट हाफ सेंचुरी जड़कर पाकिस्तान को पहले टी-20 में जीत दिलाई।
इससे पहले भारत ने पहले बैटिंग करते हुए पाकिस्तान को जीत के लिए 134 रन का टारगेट दिया था। भारत की ओर से पहले विकेट के लिए सलामी बल्लेबाज जोड़ी गौतम गंभीर और अजिंक्य रहाणे ने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया। दोनों बल्लेबाजों ने मिलकर टीम के लिए 77 रन जोड़े। पाकिस्तान को शाहिद अफरीदी ने पहला ब्रेक थ्रू दिलवाया जब रहाणे उनकी गेंद पर उमर अकमल को विकेट थमा बैठे। 12 वें ओवर की चौथी गेंद पर तेजी से रन लेने के चक्कर में गंभीर रन आउट हो गए। इसके बाद बाकी बचे बल्लेबाजों में से कोई भी अच्छे रन नहीं बना पाया और एक के बाद एक आसानी से विकेट गिरते गए। 20वें ओवर के अंत तक भारत 9 विकेट खोकर 133 रन ही बना पाया। पाकिस्तान के कप्तान मोहम्मद हफीज के विश्वास पर पाकिस्तानी बोलर काफी हद तक खरे उतरे। उमर गुल ने 3 ओवर में 21 रन देकर 3 विकेट झटके। वहीं पाकिस्तान के स्टार बोलर सईद अजमल ने भी धोनी और रैना को झटपट निपटा कर अपनी झोली में दो विकेट कर लिए। शाहिद अफीरीदी ने भी स सलामी जोड़ी को तोड़ने का काम किया और रहाणे का महत्वपूर्ण विकेट अपने खाते में जोड़ लिया। भारत के बोलिंग लाइन अप में आज इशांत शर्मा को शामिल किया गया है जो पाकिस्तान के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन करते आए हैं। अब देखना है कि पाकिस्तान अफरीदी की खराब फॉर्म के चलते 134 रन के इस टार्गेट को अचीव कर पाता है या नहीं।
बलात्कारियों की क्या हो सजा?
राकेश प्रवीर/ विमर्श
पूरे देश में इन दिनों बलात्कार की घटनाओं को लेकर राष्ट्रव्यापी चिंता बनी हुई है। आए दिन देश के किसी न किसी भाग से न केवल वयस्क लड़की अपितु अवयस्क, किशोरी यहां तक कि गोद में उठाई जाने वाली बच्चियों तक के साथ बलात्कार किए जाने की घटनाओं के मामले प्रकाश में आ रहे हैं। यह भी देखा जा रहा है कि हमारे देश की अदालतें ऐसे जघन्य अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देने में भी नहीं हिचकिचा रही हैं। यहां तक कि बलात्कार तथा उसके बाद बलात्कार पीड़िता की हत्या किए जाने के जुर्म में कोलकाता में धनंजय चटर्जी नामक एक व्यक्ति को फांसी के तख्ते पर भी लटका दिया गया। इसी प्रकार की सजा निचली अदालतों द्वारा दिए जाने के कुछ और मामले भी प्रकाश में आए हैं। परंतु जिस तरह से देश की राजधानी दिल्ली में एक 23 वर्षीय पैरामेडिकल की छात्रा के साथ चलती हुई बस में 6 लोगों द्वारा किए गए गैंगरेप के बाद उसे चलती हुई बस से बाहर फेंक दिए जाने की घटना ने एक बार फिर पूरे देश के सभ्य समाज को हिलाकर रख दिया है। क्या संसद,क्या भारतीय सिने जगत, क्या बुद्धिजीवी और क्या समाजसेवी यहां तक कि छात्र व देश के आम नागरिक सभी इस घटना से स्तब्ध रह गए हैं। एक स्वर में पूरा देश इन बलात्कारी दरिंदों को यथाशीघ्र कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग कर रहा है।
दिल्ली में हुए इस सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद जहां इन अपराधियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकद्दमा चलाकर कुछ ही दिनों के भीतर सख्त से सख्त सजा दिए जाने की मांग की जा रही है वहीं इसी दौरान एक बहस इस बात को लेकर भी छिड़ गई है कि आखिर देश में बलात्कार की बढ़ती घटनाएं रोकने के लिए और क्या अतिरिक्त उपाय किए जाएं? ऐसे जघन्य अपराध के मुजरिमों को किस प्रकार की सजाएं दी जाएं? गौरतलब है कि अभी तक भारतीय दंड संहिता में रेयर आॅफ द रेयरेस्ट समझे जाने वाले अपराधों के लिए ही सजा-ए-मौत अथवा फांसी दिए जाने का प्रावधान है। जाहिर है हत्या तथा वीभत्स तरीके से अंजाम दिए गए हत्या जैसे गंभीर आरोपों के लिए अभी तक देश की अदालतों द्वारा फांसी की सजा सुनाए जाने के मामले कभी-कभार सामने आते हैं। कोलकाता में धनंजय चटर्जी को भी अदालत ने केवल बलात्कार का दोषी होने के चलते फांसी की सजा दिए जाने का आदेश नहीं दिया था बल्कि उसके अपराध में यह भी शामिल था कि वह स्वयं एक अपार्टमेंट में सिक्योरिटी गार्ड था तथा उसके ऊपर उस अपार्टमेंट में रहने वालों की सुरक्षा का जिम्मा था। परंतु उसने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाए स्वयं ही उस अपार्टमेंट में रहने वाली एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार किया तथा बाद में उसकी हत्या भी कर डाली। यानी रक्षक ही भक्षक बन बैठा। इसीलिए अदालत ने अपने फैसले में इस बलात्कार व हत्या की घटना की तुलना इंदिरा गांधी की हत्या से करते हुए तथा धनंजय को रक्षक के रूप में भक्षक बताते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई थी।
परंतु पिछले दिनों दिल्ली के सामूहिक बलात्कार कांड के बाद चारों ओर से यह आवाजें सुनाई दे रही हैं कि बलात्कार की सजा भी मृत्यु दंड होना चाहिए। बलात्कारियों को सजा-ए-मौत दिए जाने की मांग केवल सडकों पर प्रदर्शनकारियों द्वारा ही नहीं की जा रही बल्कि देश की संसद में भी यह मांग की गई है। कई सांसद खुलकर बलात्कारी को फांसी दिए जाने के पक्ष में अपनी राय जाहिर कर रहे हैं जबकि फांसी की सजा का मानवीय दृष्टि से विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि बलात्कारी को आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए। दूसरी ओर बलात्कार जैसी दिल दहला देने वाली घटनाओं से दु:खी समाज के एक बड़े तबके का यह भी मानना है कि ऐसे अपराधियों को हिजड़ा अथवा नपुंसक बना दिया जाना चाहिए ताकि वे न केवल स्वयं अपनी करनी पर पछताएं बल्कि दूसरे भी उसे देखकर सबक हासिल करें तथा भविष्य में कोई भी व्यक्ति उस सजायाफ्ता अपराधी को देखकर बलात्कार जैसा दु:स्साहस करने की कोशिश न करे। दिल्ली की घटना से बेहद दु:खी होकर फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने इस घटना में शामिल लोगों को जानवरों से बदतर प्राणी होने की बात तो कही वहीं सांसद व अपने दौर की ख्यातनाम अभिनेत्री जया बच्चन ने कहा कि इस घटना के अपराधियों को जनता के हवाले कर दिया जाना चाहिए। परंतु क्या केवल भारतीय दंड संहिता में बलात्कारियों की सजा के विभिन्न कठोर तरीके अपनाए जाने या फांसी जैसी कठोर सजा दिए जाने के बाद क्या समाज में बलात्कार की घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा? यहां यह भी गौरतलब है कि भारत संभवत: भारत विश्व का अकेला ऐसा देश है जहां औरत को कभी दुर्गा का रूप बताया जाता है तो कभी देवियों से औरत की तुलना की जाती है। इतना ही नहीं बल्कि नवरात्रों के अवसर पर तो अवयस्क कन्याओं को अपने-अपने घरों में सम्मानित तरीके से बुलाकर उनकी पूजा करने व उन्हें प्रसाद आदि भेंट करने जैसा उत्सव भी मनाया जाता है।
इत्तेफाक से आज यदि हम राजनीति व सत्ता के क्षेत्र में भी देखें तो हमें सोनिया गांधी, मीरा कुमार, सुषमा स्वराज जैसी हस्तियां राजनीति व सत्ता के शिखर पर बैठी दिखाई देंगी। यहां तक कि हमारा देश गत दिनों देश के प्रथम नागरिक के रूप में एक महिला राष्ट्रपति को भी देख चुका है। देश के कई राज्यों में इस समय महिला राज्यपाल व महिला मुख्यमंत्री देखी जा सकती हैं। परंतु इन सब वास्तविकताओं के बावजूद समाज में महिलाओं के प्रति न तो आदर की भावना पैदा हो रही है न ही बलात्कारी प्रवृति के लोग इन सबसे भयभीत होते हैं। कुछ समाजशास्त्रियों का तो उपरोक्त बातों से अलग हटकर कुछ और ही मत है। इनका मानना है कि पारिवारिक स्तर पर लडकी व लडकों की परवरिश के दौरान उनकी बाल्यावस्था में अपनाए जाने वाले दोहरे मापदंड ही समाज में इस प्रकार की घटनाओं के जिम्मेदार हैं। प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों के पालन-पोषण में लड़कों को आक्रामक बने रहने तथा लड़कियों को यहां तक कि लड़के से बड़ी उम्र की उसकी ही बहनों को मारने व पीटने तक की घटनाओं को आंखें मूंद कर देखते हैं। परिणास्वरूप बचपन से ही लड़के को किसी भी लड़की पर अपनी प्रभुता व आक्रामकता बनाए रखने का पूरा रिहर्सल हो जाता है। इसी बात को प्रसिद्ध कहानीकार व लेखक राजेंद्र यादव ने इन शब्दों में बयान किया है कि जब तक लड़कों को राजकुमार की तरह पाला-पोसा जाता रहेगा तथा मर्दों को पति परमेश्वर का दर्जा दिया जाता रहेगा तब तक समाज में ऐसी आपराधिक घटनाएं होती रहेंगी। ऐसे में निश्चित रूप से यह एक अति गंभीर, चिंतनीय तथा अति संवेदनशील विषय है कि आख्रिर भारतीय समाज में बलात्कार जैसी शर्मनाक घटनाओं को रोकने के लिए कौन से पुख्ता उपाय किए जाएं? क्या मौत की सजा के भय से ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है? क्या आजीवन कारावास जैसी सजा देकर बलात्कारियों को सारी उम्र बिठाकर मुफ्त की रोटी खिलाना न्यायसंगत है या हिजड़ा या बधिया बनाकर बलात्कारियों को उनके दुष्कर्मों की सजा देना तथा ऐसी मानसिकता रखने वाले दूसरे लोगों के दिलों में भय पैदा करना उचित है? या फिर पारिवारिक स्तर पर बचपन से ही बच्चों की मानसिकता ऐसी बनानी होगी कि वे बड़े होकर किसी लड़की पर आक्रमकता की दृष्टि से हावी होने या उसे अपमानित करने की बात तक अपने जेहन में न ला सकें? कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि बलात्कार या यौन शोषण जैसे मामलों को रोकने के लिए सेक्स शिक्षा का ज्ञान आम लोगों को विशेषकर स्कूल, कॉलेज जाने वाले बच्चों को होना बहुत जरूरी है।
वैसे इस ज्वलंत मुद्दे पर कि बलात्कार की सजा क्या हो और क्या न हो इसका निर्धारण करने का अधिकार बुद्धिजीवियों, सांसदों या आम लोगों को होने के बजाए या इनकी सलाह लेने के बजाए देश की तमाम बलात्कार पीड़ित महिलाओं के मध्य बाकायदा एक व्यापक सर्वेक्षण करवा कर निर्धारित की जाए तो शायद सख्त से सख्त सजा की जो बातें की जा रहीं है,उसकी कुछ हद तक सार्थकता हो सकती है। क्योंकि भुक्तभोगी महिला ही अपने वास्तविक दु:ख-दर्द, उसकी पीड़ा तथा सामाजिक व पारिवारिक स्तर पर पेश आने वाली समस्याओं को बयां कर सकती है। हां इतना जरूर है कि बलात्कार के आरोप में हमारे देश में अब तक साल,दो साल या पांच-सात साल तक की अधिकतम सजाएं जो बलात्कारियों को दी जाती रही हैं वह कतई पर्याप्त नहीं हैं। निश्चित रूप से सजा ऐसी होनी चाहिए कि जो ऐसी घटना को अंजाम देने से पहले बलात्कारियों के दिल में खौफ पैदा करे। परंतु बलात्कार पीड़िता की इच्छा व उसकी मंशा को बलात्कारी को सजा दिए जाने के मामले में शामिल जरूर किया जाना चाहिए। क्योंकि बलात्कार को लेकर छिड़ी बहस को राजनैतिक रूप देने वालों या केवल आम लोगों की सहानुभूति अर्जित करने हेतु उनकी भावनाओं को भड़काने पर आधारित भाषणबाजी करने वाले लोगों से कहीं अच्छी तरह अपने दु:ख-दर्द व अपने अंधकारमय भविष्य के विषय में एक बलात्कार पीड़िता ही समझ सकती है।
यह आंदोलन नहीं गुस्सा है
आजकल आप किसी भी नुक्कड़ या सार्वजनिक स्थानों पर खड़े हो जाएं तो वहां आपको दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार की हालिया घटना और उसके बाद के घटनाक्रम पर चर्चा करते लोग मिल जाएंगे। घटना के विरोध में तीखे स्वर और पुलिस तथा सरकार की विफलताओं पर भी आपको तल्खी देखने-सुनने को मिलेगी। प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज का मामला हो या फिर प्रदर्शनकारियों की कथित पिटाई से एक कांस्टेबल की मौत का,हर व्यक्ति अपने गुस्से का इजहार करता मिलेगा। इस गुस्से को दिल्ली से लेकर पटना और अन्य सुदूरवर्ती इलाकों तक महसूसा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में बलात्कार की यह कोई पहली घटना है। बलात्कार की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन 16 दिसम्बर की रात चलती बस में सामूहिक बलात्कार के बाद लड़की को गंभीर हालत में जिस तरह से सड़क पर फेंका गया, उससे लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। लोग बड़ी तादाद में सड़कों पर निकले और उनकी नाराजगी सबने देखी। दरअसल यह नाराजगी आम लोगों की थी। कोई संगठन, पार्टी या सुनियोजित समूह इसके पीछे नहीं था। मगर यह गुस्सा कारगर रहा। इस गुस्से ने कई नए बदलावों को सामने लाया है। संभव है कि आने वाले दिनों में इसके सार्थक परिणाम भी आए। जनता के विरोध को देखते हुए सरकार ने यौन उत्पीड़न मामलों में मौजूदा कानूनों की समीक्षा के लिए एक अधिसूचना जारी की। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय समिति से मौजूदा कानूनों में संभावित संशोधन पर 30 दिनों में सुझाव मांगे गए हैं। प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस ने बल प्रयोग किया,मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को दुहाई देनी पड़ी कि उनकी भी बेटियां हैं। लचर कानून व्यवस्था पर सवाल उठे और दिल्ली पुलिस आयुक्त को हटाने की मांग हुई लेकिन गाज गिरी दो सहायक पुलिस आयुक्तों पर। दरअसल इस गुस्से से बचने के लिए ही और भी कई कदम उठाए गए हैं।
Sunday, December 23, 2012
‘क्रिकेट के भगवान’ की एक पारी का अंत
भारतीय क्रिकेट जब जब संकट के दौर से गुजरा, संकट से उबारने के लिए सचिन रमेश तेंदुलकर के रूप में भगवान ने अवतार लिया। सचिन तेंदुलकर ने भारतीय क्रिकेट को एक नई ऊंचाई दी। आज क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने अपने क्रिकेट करियर की एक पारी की समाप्ति की घोषणा करते हुए वनडे क्रिकेट को संन्यास ले लिया। भारत में क्रिकेट दरअसल खेल नहीं धर्म है और उस धर्म में सचिन भगवान की तरह पूजे जाते हैं। उनका अचानक वनडे क्रिकेट को अलविदा कहना करोड़ों प्रशंसकों के लिए सदमे से कम नहीं है। अब सचिन को चाहने वालों को उनका कलात्मक खेल नहीं दिखेगा, न तो टी-20 और न ही वनडे में। टी-20 से तो सचिन ने पहले ही संन्यास ले लिया था। अपने 23 साल के क्रिकेट करियर में सचिन ने दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज शोएब अख्तर और सबसे बेहतरीन स्पिनर शेन वॉर्न को अपनी बल्लेबाजी का लोहा मनवाया। दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाजों में सबसे श्रेष्ठ सचिन के सामने उनके समकक्ष ब्रायन लारा और रिकी पॉन्टिंग भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते हैं। सचिन सिर्फ बेहतरीन क्रिकेटर ही नहीं बल्कि सुलझे हुए इंसान भी हैं। कभी विवादों में नहीं रहने वाले सचिन को तभी तो राज्यसभा में बतौर सांसद मनोनीत किया गया। सचिन तेंदुलकर ने अपने क्रिकेट करियर में कीर्तिमानों की झड़ी लगा दी, इसलिए सचिन को क्रिकेट का शहंशाह कहा जाता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक बनाया। सचिन ने 100वां शतक बांग्लादेश के खिलाफ 16 मार्च 2012 को मीरपुर में बनाया था। वनडे करियर की शुरूआत सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के गुजरांवाला में भारत के चिरप्रतिद्वंदी पाकिस्तान के खिलाफ की थी। टेस्ट करियर का आगाज भी 1989 में पाकिस्तान के कराची में किया था। पहला शतक लगाने में सचिन को पांच साल लग गए। सचिन का कीर्तिमान क्रिकेट में अमर रहेगा।
नीतीश की चुप्पी का राज
Sunday, December 16, 2012
दिल्ली के गरीबों के साथ दिल्लगी ?
क्या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली के गरीबों के साथ मजाक किया है। ये सवाल उठ खड़ा हुआ है शीला दीक्षित के एक बयान से। शनिवार को शीला दीक्षित ने अन्नश्री योजना की शुरूआत की थी। योजना है गरीब परिवारों को हर महीने अनाज के बदले 600 रुपए देने की। शीला दीक्षित ने इस कार्यक्रम में कहा कि दिल्ली में पांच लोगों का परिवार छह सौ रुपए महीने में अच्छे से पेट भर सकता है। उसे कम से कम दाल, चावल और गेहूं तो मिल ही सकता है। अब सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में रहने वाले किसी आदमी का पेट सिर्फ 4 रुपए में भर सकता है। आप कहेंगे की दिल्ली क्या देश और दुनिया के किसी कोने में भी 4 रुपए में पेट नहीं भरा जा सकता हैं। लेकिन दिल्ली की मुख्यमंत्री के मुताबिक दिल्ली में ऐसा संभव हैं। यकीन नहीं हो रहा हो तो आप खुद जानिए किस तरह दिल्ली की मुख्यमंत्री ने गरीबों का मजाक उड़ाया है। शीला दीक्षित ने कहा, ‘सरकार अन्नश्री के तहत हर महीने गरीब परिवारों को 600 रुपए देगी। मैं समझती हूं दिल्ली में पांच लोगों का परिवार छह सौ रुपए महीने में अच्छे से पेट भर सकता है।’ शीला दीक्षित ने ये बात अन्नश्री योजना की शुरूआत करते वक्त कही थी तब वहां सोनिया गांधी भी मौजूद थीं। अन्नश्री योजना के तहत दिल्ली के गरीब परिवारों को 600 रुपये नकद सब्सिडी दी जाएगी। शीला कह रही हैं कि एक परिवार में 5 सदस्यों के लिए ये रकम काफी है। अब जरा इस हिसाब को देखिए, एक परिवार में 5 लोगों के लिए एक महीने में दिल्ली सरकार 600 रुपये देगी। मतलब 5 लोगों के लिए एक दिन के खाने का बजट 20 रुपये हुआ। इसका मतलब ये हैं कि एक आदमी के लिए एक दिन में 4 रुपये ही होगा। शीला दीक्षित के मुताबिक 4 रुपये में पेट आराम से भर सकता है। यानी दिन और रात का भोजन 2-2 रुपए में। यानी शीला दीक्षित तो योजना आयोग के उपाध्यक्ष से भी कमाल की योजनाकार निकलीं। इसे अब दिल्ली के गरीबों का मजाक नहीं तो और क्या कहा जाएगा।
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