Wednesday, January 29, 2020

मुस्लिम आक्रांताओं का नफरती हिन्दू विरोध
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मुहम्मद गजनी के आने और अहमदशाह अब्दाली की वापसी के बीच जो 762 वर्षों की अवधि रही, उस दौरान ‘जिहाद’ हिन्दुओं की स्थिति पर सुल्तान अलाउद्दीन के एक काजी ने जो कहा है उसकी कुछ पंक्तियां आज के तथाकथित हिन्दू सेक्युलर, डिजायनर बुद्धिजीवियों के लिए -
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उन्हें (हिन्दुओं) खिराज (कर) अदा करने वाला कहा जाता है और जब राजस्व अधिकारी उनसे चांदी मांगे तो उन्हें बिना सवाल उठाए अति विनम्रता और आदर व्यक्त करते हुए सोना देना चाहिए। यदि अधिकारी उनके मुंह में मैला फेंके तो उन्हें निस्संकोच अपना मुंह खोल कर उस ले लेना चाहिए......। मुंह में मैला फेंके जाने और इस विनम्र अदायगी से धर्म की अपेक्षित अधीनता ही व्यक्त होती है। इस्लाम का गरिमागान एक कत्र्तव्य और दीन के प्रति अनादर दंभ है। खुदा उनसे नफरत करता है और उसका आदेश है कि उन्हें दासता में रखा जाए।

हिन्दुओं को अपमानित करना खासतौर पर एक मजहबी फर्ज है, क्योंकि वे पैगंबर के सर्वाधिक कट्टर दुश्मन हैं और क्योंकि पैगंबर ने हमें उनका कत्ल करने, उन्हें लूटने और गुलाम बनाने का आदेश यह कहते हुए दिया है-‘उन्हें इस्लाम में दीक्षित करो अथवा मार डालो और उन्हें गुलाम बनाओ और उनकी धन-संपदा को नष्ट कर दो। किसी अन्य धर्माचार्य ने नहीं, अपितु महान धर्माचार्य (हनीफ) ने, जिसकी राह के हम अनुगामी हैं, हिन्दुओं पर जजिया लगाए जाने की इजाजत दी है। अन्य पंथों के धर्माचार्य भी किसी अन्य विकल्प की नहीं, अपितु ‘मौत या इस्लाम’ की ही अनुमति देते हैं।’

इतिहासकार लेन पूल के अनुसार-‘ हिन्दुओं पर कर उनकी भूमि के उत्पादन में से आधार तक था और उन्हें अपनी सभी भैंसों, बकरियों और अन्य दुधारू पशुओं पर भी कर चुकाना पड़ता था। धनी और निर्धन सभी को प्रति एकड़ और प्रति पशु की दर से समान रूप से कर चुकाना होता था। रिश्वतखोर संग्राहक या अधिकारी उनकी बेंतों, चिमटों से पिटाई करते थे तथा मुश्कें और हथकड़ियां-बेड़ियां डालने जैसी कड़ी सजा दी जाती थी। ऐसी व्यवस्था की गई थी, एक राजस्व अधिकारी बीस विशिष्ट हिन्दुओं को शिकंजे में कसकर उन पर घूसों से प्रहार करें और वसूली कर सकें।

किसी भी हिन्दू घर से सोना अथवा चांदी तो क्या, सुपारी, जिसे किसी खुशी के अवसर पर पेश किया जाता है, तक भी दिखाई नहीं देती थी और इन असहाय बना गए देशज अधिकारियों की पत्नियों को मुसलिम परिवारों में नौकरी करके गुजारा करना पड़ता था।...... ये राजाज्ञाएं इतनी कठोरता से लागू की गई थीं कि चैकीदार, खूट और मुकद्दिम घोड़े की सवारी नहीं कर सकते थे, हथियार नहीं रख सकते थे, न ही अच्छे कपड़े पहन सकते थे और पान भ्ज्ञी नहीं चबा सकते थे....कोई भी हिन्दू अपना सिर नहीं उठा सकता था....वसूली करने के लिए घंूसे माना जाना, माल भत्ता जब्त किया जाना, कैद और बेड़ियां डाले जाने आदि सभी तरीके अपनाए जाते थे।

यह वह दौर था जब हिन्दुओं को इतनी लाचार स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया गया था  िकवे सवारी के लिए घोड़ा तक भी नहीं रख सकें और ही अच्छे वस्त्र पहन सकें और न ही जीवन का कोई और सुखोपयोग कर सकें।

फिरोजशाह के शासनकाल (1351-1388)में फरमान था-‘ ब्राह्मण या तो मुसलमान बन जाएं अथवा उन्हें जला दिया जाए।’ ‘तबकाते-नसीरी’ के अनुसार मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने निद्दिया (बिहार) पर कब्जा कर लिया तो भयंकर लूटपाट की और हजारों सिर मुंडे हुए ब्राहम्णों को मौत के घाट उतर दिया।

इतिहास प्रमाणित है कि गजनी के मुहम्मद ने भारत पर अपने हमलों को ‘जिहाद’ छेड़ने की संज्ञा दी थी। मुहम्मद के इतिहासकार अल उतबी ने उसके हमलों के बारे में लिखा था-‘ उसने मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ कर इसलाम की स्थापना की। उसने शहरों पर कब्जा किया। नापाक कमीनों को मार मार डाला, मूर्ति-पूजकों को तबाह किया और मुसलमानों को गौरवान्वित किया। तदुपरांत वह घर लौटा और इसलाम के लिए की गई विजयों का ब्योरा दिया और यह संकल्प व्यक्त किया कि वह हर वर्ष हिंद के खिलाफ जिहाद करेगा।

मुहम्मद गौरी के इतिहासकार हसन निजामी ने उसके बारे में लिखा है- ‘उसने अपनी तलवार से हिंद को कुफ्र की गंदगी से साफ किया और पाप से मुक्त किया तथा उस सारे मुल्क को बहुदेववाद के कंटक से स्वच्छ किया और मूर्तिपूजा की अपवित्रता से पाक किया और अपने शाही शौर्य और साहस का प्रदर्शन करते हुए एक भी मंदिर को खड़ा नहीं रहने दिया।’

तैमूर अपने संस्मरण में भारत पर हमला करने को प्रेरित करने वाले कारणों का उल्लेख करते हुए कहता है- ‘ मेरा हिन्दुस्तान पर हमलों का मकसद काफिरों के खिलाफ अभियान चलाना और मुहम्मद के आदेशानुसार उन्हें सच्चे दीन में धर्मांतरित करना है। उस धरती को मिथ्या आस्था और बहुदेववाद से पवित्र करना है तथा मंदिरों और मूर्तियों का विघ्वंस करना है, हम गाजी और मुजाहिद होंगे और अल्लाह की नजर में सहयोगी और सैनिक सिद्ध होंगे।’
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डा. बाबासाहेब आंबेडकर लिखित पुस्तक-★ 'Pakistan or Partition of India' का एक अंश जो  प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित ‘ डा. आंबेडकरः राष्ट्र दर्शन’ में संकलित से साभार

Monday, January 27, 2020

मुस्लिमपरस्ती और दलितों की उपेक्षा कांग्रेस की पुरानी नीति
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CAA के बहाने जिस तरह से कांग्रेस तीन इस्लामिक देशों से धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर हिंदुस्तान में शरण लिए दलित शरणार्थियों  को नागरिकता देने का विरोध कर रही है वह उसकी पुरानी "दलित विरोधी व मुस्लिमपरस्ती की नीति" का ही हिस्सा है।

कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की दलित विरोधी व मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के विरोध में ही डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने 10 अक्टूबर,1951 को उनके मंत्रिमंडल से कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

इस्तीफा देने के बाद 10 अक्टूबर,1951 को लोकसभा में दिए अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर ने कहा- " भारत में अछूतों को किसी प्रकार की सुविधा प्रदान नहीं की गई है। सरकार को मुसलमानों के संरक्षण की ही अधिक चिंता है। प्रधानमंत्री का पूरा समय मुसलमानों की चिंता में खर्च होता है। ...मैं जानना चाहता हूं कि ऐसे संरक्षण की मुसलमानों को क्यों जरूरत है? इस तरह की व्यवस्था की आवश्यकता अपृश्य जातियों व भारतीय ईसाइयों की क्यों नहीं हैं? वस्तुतः मुसलमानों से कहीं अधिक सुरक्षा की आवश्यकता जिन लोगों को है, उन लोगों की चिंता प्रधानमंत्री को कितनी है? सरकार ने अछूत जाति के बारे में जो उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया है, उसके कारण मेरे मन में रोष उतपन्न हुआ है।"
(पुस्तक: "डॉ. आंबेडकर-राष्ट्रदर्शन" प्रभात प्रकाशन, से साभार)

दरअसल कांग्रेस आज भी दलित विरोध की अपनी उसी नीति पर कायम है। दशकों तक दलितों का वोट लेने वाली कांग्रेस सी ए ए कानून का विरोध इसलिए कर रही है कि इससे जिन शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी, उनमें 75-80 प्रतिशत दलित हैं। काश आज डॉ. आंबेडकर की तरह दलितों का कोई सर्वमान्य नेता होता जो कांग्रेस के दलित विरोध की इस नीति के खिलाफ अपना रोष व्यक्त करता!

Saturday, January 18, 2020

राज्य नागरिकता कानून को लागू करने से इनकार नहीं कर सकता, यह असंवैधानिक होगा
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* सिब्बल ने कहा- संसद से पास हुए कानून का पालन न करना किसी राज्य के लिए बेहद मुश्किल हालात बना देगा

* सीएए को लेकर देशभर में जारी आंदोलन पर सिब्बल ने कहा- यह एक नेता और आम लोगों के बीच युद्ध की तरह

* बंगाल, राजस्थान, केरल, पुड्डुचेरी, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सरकार ने कहा था कि वे सीएए को लागू नहीं करेंगे

Dainik Bhaskar
Jan 18, 2020
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कोझिकोड (केरल)। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा है कि कोई भी राज्य नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू करने से इनकार नहीं कर सकता। केरल लिट्रेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन शनिवार को कोझिकोड में उन्होंने कहा कि संसद में पास होने के बाद राज्य अगर कानून लागू करने से इनकार करते हैं, तो यह असंवैधानिक होगा। इससे पहले बंगाल, राजस्थान, केरल, पुड्डुचेरी, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सरकार ने कहा था कि वे इस कानून को लागू नहीं करेंगे। इन 8 राज्यों में देश की 35% आबादी रहती है।

पूर्व कानून मंत्री सिब्बल ने कहा- अगर सीएए को संसद की मंजूरी मिल चुकी है, तो कोई राज्य यह नहीं कह सकता कि वह इसे लागू नहीं करेगा। यह संभव नहीं है और ऐसा करना असंवैधानिक है। हालांकि राज्य इसका विरोध कर सकते हैं और विधानसभा में इसके खिलाफ संकल्प पारित कर सकते हैं। राज्य केंद्र सरकार से इसे वापस लेने की मांग भी कर सकते हैं, लेकिन किसी का यह कहना कि मैं इस कानून को लागू नहीं करूंगा, ज्यादा बड़ी समस्या पैदा करेगा। जब कोई राज्य ऐसा कहता है कि वो इसे लागू नहीं करेगा, तो माना जाना चाहिए कि उसकी इच्छा इस कानून को लागू करने की नहीं है। हालांकि उसके हाथ बंधे हुए हैं।

सिब्बल ने कहा- एनआरसी का आधार एनपीआर
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सिब्बल ने कहा, “नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) दरअसल जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) पर आधारित है। एनपीआर को स्थानीय रजिस्ट्रार के जरिए लागू किया जाएगा, जिसकी नियुक्ति सामुदायिक स्तर पर होगी। अगर राज्य यह कहते हैं कि हम राज्य के कर्मचारियों को केंद्र के साथ सहयोग नहीं करने को कहेंगे। मुझे नहीं मालूम कि यह संभव है या नहीं, लेकिन संवैधानिक तौर पर किसी राज्य के लिए संसद से पास हुए कानून का पालन न करना बेहद मुश्किल हालात बना देगा।”

सीएए के खिलाफ आंदोलन आम लोगों ने खड़ा किया। सीएए को लेकर देशभर में जारी आंदोलन पर सिब्बल ने कहा कि यह नेता और आम लोगों के बीच युद्ध की तरह है। उन्होंने कहा- शुक्र है किसी राजनेता की जगह देश के छात्र, गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों ने इसके खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। उन्होंने कहा, “इसका असर इसलिए दिखाई दे रहा है, क्योंकि दुनिया भर में लोग यह समझ रहे हैं कि यह राजनीति नहीं है, बल्कि यह आम लोगों का आंदोलन है। वे लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए नहीं हैं। उनकी चिंता भारत के भविष्य को लेकर है। हर कोई विकास चाहता है।” सिब्बल ने सवाल उठाया कि मोदी ने क्या किया। उन्होंने देश के बजाय खुद का विकास किया।

8 राज्य सरकारों ने सीएए लागू न करने को कहा था
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बंगाल, राजस्थान, केरल, पुड्डुचेरी, पंजाब, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सरकार ने कहा था कि वे इस कानून को लागू नहीं करेंगे। इन 8 राज्यों में देश की 35% आबादी रहती है। वहीं, 3 और राज्य सरकारें ऐसी हैं जो सीएए के विरोध में तो हैं, लेकिन इस कानून को लागू होने देंगी या नहीं, इस पर उनका रुख साफ नहीं है। इन राज्यों को भी जोड़ दिया जाए तो 42% आबादी वाली 11 राज्य सरकारेंसीएए का विरोध कर चुकी हैं।

राज्य आबादी भूभाग किसकी सरकार
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बंगाल 7.3% 2.8% ममता बनर्जी, तृणमूल
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महाराष्ट्र 9.3% 9.3% उद्धव ठाकरे, शिवसेना
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मध्यप्रदेश 6% 9.3% कमलनाथ, कांग्रेस
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राजस्थान 5.7% 10% अशोक गहलोत, कांग्रेस
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केरल 2.6% 1.1% पिनरई विजयन, माकपा
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पंजाब 2.2% 1.5% अमरिंदर सिंह, कांग्रेस
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छत्तीसगढ़ 2% 4.11% भूपेश बघेल, कांग्रेस
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पुड्‌डुचेरी 0.1% 0.1% नारायणसामी, कांग्रेस
कुल 35% 38%
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केरल सरकार सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी
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14 जनवरी को केरल सरकार सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी सरकार का तर्क था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन है। केरल ने इस कानून को रद्द करने के लिए 31 दिसंबर को विधानसभा में प्रस्ताव भी पारित किया था। सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहले ही 60 याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। कोर्ट इन पर 22 जनवरी को सुनवाई करेगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 10 जनवरी को सीएए को लेकर अधिसूचना जारी की थी।

शाहीनबाग का धरना और कांग्रेस की असली मंशा...सचेत,सतर्क रहें सरकार
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शाहीनबाग के धरने पर लोग भाजपा को यह सलाह दे रहे हैं कि वह इस प्रदर्शन पर उसी तरह से हमला करें,
जैसे कांग्रेस ने बाबा रामदेव के ऊपर रात्रि में किया था ।
लेकिन वे सब क्या यह नहीं समझते कि यह प्रायोजित भीड़ कांग्रेस ने इसलिए ही तो रोक रखी है कि भाजपा ऐसा करने को विवश हो जाए।
कांग्रेस ने चारा फेंककर जाल बिछाया है,
और टकटकी लगाए अपनी पूरी ब्रिगेड के साथ इन्तेजार में बैठी है ।
इस चारे में उसने छोटे छोटे बच्चों को रखा है, तो 80-90 साल के वृद्धों को भी रखा है । उन सबको पता भी नहीं कि कांग्रेस उन सबको मारने के इंतजाम करके इंतज़ार में है।
👉लाठीचार्ज हुआ तो गोली बम फोड़ने वाले लोग भी उनके अंदर छुपे हुए तैयार बैठे हैं । ताकि मामला बड़ा हो सके और भाजपा को एक आततायी, लोकतंत्र की हत्यारी, आजादी छीनने वाली, हिटलरशाही सरकार का दर्जा दिया जा सके और बाद में अगले हरेक चुनाव में गुजरात की तरह भुनाया जा सके ।
👉जैसे ही यह हुआ..... प्रेस कॉन्फ्रेंस, अस्पतालों का दौरा, कुछ मुआवजा, लल्लनटॉप, क्विंट, बीबीसी, ndtv जैसे रखैलों से न्यूज़ बनवाना, चिंदीचोर कन्हैय्या, शेहला, स्वरा आदि कौवों से कांव कांव करवाना, कोर्ट में केस डालने से लेकर मानवाधिकार एजेंसी को उतारते हुए
एक पूरा जाना पहचाना सीरीज है जिसे अब सभी जानने लगे हैं ।
मेरा सुझाव है कि भाजपा को बिलकुल भी एक्शन नहीं लेना चाहिए   ..........ये लोग दिल्ली चुनाव के बाद अपने आप ही चले जाएँगे.......थक हार कर ......
जब पैसा देने वाले और लंगर चलाने वाले लोग कडके हो जाएंगे
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Friday, January 17, 2020


ब्रू को अब मिलेगा ठिकाना
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मिजोरम की "ब्रू" जनजाति  जो २२ साल से अपने घर मिजोरम से दूर त्रिपुरा में अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए रह रहे थे को केंद्र सरकर त्रिपुरा में बसएगी।...ब्रू जनजाति हिन्दू धर्म की वैष्णव परंपरा से है.

ब्रू मुख्यतः मिजोरम,त्रिपुरा और कुछ असम के हिस्सों में पाए जाने वाली जनजाति है. और मिजोरम की अगर बात करें तो ये मुख्यतः २ जिले "मामित" और "कोलासिब" में रहते हैं. इन्हें त्रिपुरा में "रियांग" भी कहा जाता है.

मिजोरम में ब्रू जनजाति और मिजो जनजाति के बीच 90 के दशक में लगातार संघर्ष चल रहा था...उसका एक मुख्य कारण ये था कि मिजो जनजाति जो कि वर्तमान में ईसाई रिलिजियन को फॉलो करती है वो ब्रू जनजाति को बाहरी वर्ग मानती थी. 1997 में ये संघर्ष बहुत हिंसक हो गए जिसके चलते ब्रू जनजाति से जुड़े अधिकांश लोगों को मिजोरम से अपने घर छोड़ कर त्रिपुरा में शरण लेने पर मजबूर होना पड़ा...

पूर्वोत्तर में जातीय पहचान को मुद्दा बना कर लोग अलग राष्ट्र की मांगें करते आये थे जिनपर पूर्व की भारत सरकारों ने ढुलमुल रवैय्या अपनाया हुआ था..मिज़ो उग्रवादी समूहों द्वारा भी इस तरह की मांगे रखी गयीं थीं..

जब मिजो उग्रवादी समूहों को लगने लगा कि उनकी अलग राष्ट्र की मांगें पूरी नहीं हो सकतीं तो उन्होंने हिंसक तरीके अपनाने शुरू किये और उस हिंसा की चपेट में सबसे पहले "ब्रू" जनजाति आयी जो कि धार्मिक रीतिरिवाजों में मिजो समुदाय से अलग थी.

साल 1995 में मिजो जनजाति से जुड़े यंग मिजो असोसिएशन और स्टूडेंट मिजो असोसिएशन ने ब्रू  जनजाति को बाहरी घोषित कर दिया..

इसके बाद लगातार चलते संघर्ष का परिणाम ये हुआ कि साल 1997 में ब्रू जनजाति को अत्यधिक हिंसा का सामना करना पड़ा..और उनकी अधिकांश आबादी को मिजोरम छोड़कर त्रिपुरा भागना पड़ा.. ब्रू नेशनल यूनियन के मुताबिक लगभग उनके 1391 घरों और 41 गाँवों को जलाया गया और बड़ी संख्या में ब्रू समुदाय से जुड़े लोगों कि हत्या और महिलाओं के बलात्कार हुए.

इसके चलते लगभग 37000 ब्रू जनजाति से जुड़े लोग मिजोरम से भाग कर त्रिपुरा पहुँच गए..

सन 2010 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने 1600 ब्रू समुदाय से जुड़े 8000 लोगों को मिजोरम में बसाया था लेकिन मिजो समुदाय के विरोध के चलते इस पर काम आगे नहीं बढ़ सका.

पिछले 22 सालों में मात्र 5 हज़ार ब्रू समुदाय से जुड़े लोग वापस मिजोरम गए थे..और अब भी 32000 लोग त्रिपुरा में ही विस्थापित थे..

अब तक की सारी सरकारों के प्रयास व्यर्थ जाने के बाद मोदी सरकार ने CAA लागू करने के बाद एक और बड़ा कदम उठाया है..

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि त्रिपुरा में लगभग 30,000 ब्रू शरणार्थियों को बसाया जाएगा। उन्होंने इसके लिए 600 करोड़ के पैकेज का भी ऐलान किया।

साथ ही -------->

* सभी ब्रू विस्थापित परिवारों को 40x30 फुट का प्लाट दिया जाएगा

* आर्थिक सहायता के लिए प्रत्येक परिवार को 4 लाख रुपये फिक्स्ड डिपॉजिट में..

* दो साल तक 5 हजार रुपये प्रतिमाह नकद सहायता..

* दो साल तक फ्री राशन व मकान बनाने के लिए 1.5 लाख रुपये दिये जाएंगे..

* इस नई व्यवस्था के लिए त्रिपुरा की भाजपा सरकार भूमि की व्यवस्था करेगी..

त्रिपुरा/असम/मिजोरम के मुख्यमंत्रियों के साथ दशकों पुरानी समस्या का शांतिपूर्ण समाधान केंद्र में 303 सीट और राज्यों में अपनी सरकारों के रहते संभव हुआ है.

न मीडिया ने कभी इन शरणार्थियों के बारे में दिखाया. न हम जैसे लोगों को भी कभी इनके होने का पता चला..

अब जब केंद्र सरकार ने पहल कर इन्हें न्याय दिया है तब जाकर अहसास हुआ है कि देश में एक मजबूत सरकार हो और राज्यों में उसके पास बहुमत हो तो दशकों पुरानी समस्याएं भी सुलझायी जा सकती हैं.

बहरहाल ये सबके समझने के लिए नहीं है..अभी भी एक बहुत बड़ी आबादी फ्री बिजली/फ्री पानी पर अपने हिसाब से वोट करती है..

ये संघर्ष हर किसी को नहीं दिखता..जिन्हें दिखता है उन्हें लड़ना पड़ता ही है.

Tuesday, September 17, 2019

नमो का बिहार कनेक्शन



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का 17 सितंबर को 69वां जन्मदिन है और बिहार बीजेपी (BJP) की तरफ से इस मौके को खास बनाने की पूरी तैयारी हो रही है. नमो का बिहार कनेक्शन (Bihar Connection) भी काफी गहरा रहा है. जी हां, बिहार और पीएम नरेंद्र मोदी का एक दूसरे से गहरा नाता रहा है. राजनीतिक जानकार बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार करने हुंकार रैली में जब मोदी गांधी मैदान (Gandhi Maidan) पहुंचे और इस दौरान रैली में जो विस्फोट हुआ, उसके बाद उनके पक्ष में पूरे देश में माहौल ही बदल गया था. शायद यही वजह है कि मोदी के लिए बिहार खास बन गया है.

नमो और बिहार का रिश्‍ता
1.नरेंद्र मोदी के बिहार से कनेक्शन की शुरुआत 2004 से ही हो गई थी, जब लुधियाना की रैली में नीतीश कुमार और मोदी की हाथ उठा कर एक फोटो सामने आयी थी. इस तस्वीर को लेकर तब ख़ूब चर्चा हुई थी और आज भी वो तस्वीर चर्चा में बनी हुई है.

2- नरेंद्र मोदी 2010 में जब बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जो गांधी मैदान में हुई थी, में शामिल होने के लिए पटना पहुंचे थे. देश के कई बीजेपी शासित राज्य के मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेता भी पटना एयरपोर्ट पहुंचे थे. तमाम बड़े नेता कार में बैठकर मीटिंग में शामिल होने के लिए निकल गाए, लेकिन मोदी कार्यकर्ताओ से मुलाक़ात करने चले गए. उसके बाद ही कार्यकारिणी की बैठक में शामिल होने निकले.

3- बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद जो घटना हुई वह खासी चर्चा में रही. नीतीश कुमार ने बीजेपी के बड़े नेताओं के लिए दिए गए भोज को अंतिम समय में कैंसिल कर दिया था. इससे बीजेपी और जेडीयू के रिश्तों में काफ़ी तनाव बढ़ गया था, लेकिन इस घटना ने बिहार बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओ में मोदी के लिए क्रेज़ बढ़ा दिया और कार्यकारिणी की बैठक के बाद गांधी मैदान में जो रैली हुई तब गांधी मैदान में समर्थकों ने नमो का मास्क लगा उनके समर्थन में ख़ूब नारेबाज़ी की थी. यही नहीं, जेडीयू के समर्थकों से डाक बंगला में बीजेपी समर्थकों से भिड़ंत भी हुई थी.

4- इस घटना के बाद नीतीश कुमार के अड़ियल रूख ने बीजेपी के लिए मुसीबत बढ़ा दी और उसी दबाव में मोदी बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार करने नहीं पहुंचे.

5-मामला यही नहीं रुका, कोशी बाढ़ राहत के लिए जब कई राज्यों ने बिहार सरकार की मदद के लिए राशि भेजी, तब नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात सरकार के तरफ़ पांच करोड़ रुपए और सामान भिजवाया था. सामान भिजवाने के पांच दिन के बाद पटना में कई जगह पर गुजरात सरकार की मदद का नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाला पोस्टर लगा था, जिसके कारण नीतीश कुमार ने राशि और मदद वापस लौटा दी. इससे दोनों के रिश्‍ते खराब हुए.
6-मोदी ने बिहार से अपने गहरे सम्बंध को बनाए रखा और जब गुजरात विधान सभा चुनाव हुआ तब उन्‍होंने बिहार के कई नेताओं को गुजरात में चुनाव प्रचार के लिए बुलाया था.

7-आख़िरकार बीजेपी और जेडीयू के सम्बंध खराब होते चले गए और 16 जून 2013 को दोनों का गठबंधन टूट गया. हालांकि नमो का बिहार से कनेक्शन बढ़ता ही जा रहा था. बीजेपी के वरिष्ठ नेट कैलाश पति मिश्र का जब निधन हुआ तब मोदी पटना पहुंचे थे.

8-इस बीच नरेंद्र मोदी का कद बीजेपी में तेजी से बढ़ता चला गया और 2013 आते-आते नमो को बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. जब देशभर में मोदी की लहर बढ़ती जा रही थी, तब देश में पहली नमो चाय की शुरुआत पटना से ही हुई थी, जो चर्चा की वजह बनी.

9-2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए जब मोदी 27 अक्टूबर को गांधी मैदान पहुंचे तो रैली में बम विस्फोट की घटना से हर कोई दहल गया. मोदी के पक्ष में सहानुभूति की ज़बरदस्त लहर बनी और देश-बिहार में भी बीजेपी को शानदार सफलता मिली. जबकि जेडीयू मात्र 2 सीट पर सिमट गई थी.

10- 2014 में मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो बिहार के लिए उन्होंने विशेष पैकेज का वादा किया था. जबकि बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन (नीतीश और लालू की जोड़ी) थी. पीएम मोदी ने बिहार में तूफ़ानी चुनाव प्रचार किया और इसी दौरान मुजफ्फरपुर रैली के दौरान उन्‍होंने नीतीश के DNA का मुद्दा उठाया था. इसका असर चुनाव परिणामों पर हुआ.

11.विधानसभा प्रचार के दौरान ही नमो ने आरा के मैदान में बिहार के लिए सवा लाख करोड़ का स्पेशल पैकेज देने का वादा किया था. हालांकि बाद में बिहार सरकार को अधिकांश राशि मिली भी.

12- बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम आने के एक साल के बाद ही महागठबंधन में नीतीश कुमार घुटन महसूस करने लगे और इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं घटती चली गईं, जिसने नीतीश और पीएम मोदी को करीब ला दिया. नोट बंदी पर नमो का समर्थन करना, प्रकाश पर्व में नमो का आना और नीतीश कुमार के साथ मंच शेयर करना, लालू यादव को सामने जमीन पर बैठाना, ऐसी कुछ घटनाएं होती चली गईं, जिसकी वजह से नीतीश ने महागठबंधन का दामन छोड़ दिया. इसके बाद भाजपा और जेडीयू ने सरकार बना ली.

13-इस बीच नरेंद्र मोदी कई केंद्रीय योजनाओं के उद्घाटन के सिलसिले में बिहार पहुंचे और साथ ही बिहार को कई बड़ी सौग़ात दीं.

14- 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार ने भी नमो को शानदार तोहफ़ा दिया और 40 में से 39 सीट झोली में डाल दीं, लेकिन बिहार में ही उनके सहयोगी के रूख ने बीजेपी के लिए थोड़ा तनाव भी बढ़ाया. जेडीयू ने धारा 370, तीन तलाक़ और NRC जैसे मुद्दे पर जेडीयू ने विरोध के स्वर दिखाए हैं.

जेडीयू और भाजपा ने कही ये बात
बहरहाल, नमो के लिए बिहार से खट्टे-मीठे रिश्ते समय-समय पर आते रहे हैं, लेकिन आज भी बिहार बीजेपी के नेता हों या सहयोगी पीएम के बिहार से नज़दीकी रिश्ते का हवाला ज़रूर देते हैं. जेडीयू के मंत्री नीरज कुमार और जय कुमार सिंह कहते हैं कि बिहार ख़ास है और कई इतिहास का गवाह भी रहा है. बिहार ने पीएम मोदी को काफ़ी कुछ दिया है और यही बात खास रिश्‍ता बनाती है. जबकि बीजेपी विधायक मिथिलेश तिवारी कहते हैं कि पीएम मोदी के लिए बिहार काफ़ी लकी रहा है.

पाकिस्तान-टुकड़ा-टुकड़ा हो जायेगा?




अमानवीय आतंकवाद व नफरत के इतने गड्ढे नापाक पाकिस्तान ने खुद खोद डाले हैं कि एक दिन उसका टुकड़ा-टुकड़ा हो कर उसी में दफन होना तय है। एक ओर जहां बलूचिस्तान अमानवीय अत्यचार से बिलबिला रहा है,सिंध सहमा और कराची कंगाली से कराह रहा हैं,वहीं बलात कब्जे वाला गुलाम कश्मीर (पीओके) मुक्ति के लिए छटपटा और "यह जो दहशतगर्दी है,उसके पीछे वर्दी है"का नारा लगा कर पाकिस्तानी जोर-जुल्म की कहानी दुनिया को बता रहा है।

आखिर पाकिस्तानी कठमुल्ला,बेगैरत हुक्मरान,आतंक की फैक्ट्री चलाने वाली सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई कितने दिनों तक आवाम की आवाज़ को दबा और दुनिया की आंखों में धूल झोंक पाएंगे?...नफरत की आग सुलगा कर रखने वाले एक दिन उसी आग में झुलस कर खाक हो जाएंगे।

सोचिये, ऐसा क्यों है?



जगह-जगह भीड़ "न्याय"करने पर उतारू है। पुलिस पर हमले आम बात है। बिहार के एक पूर्व डीजीपी का कहना है कि-"आम आदमी यह मान बैठा है कि पैसा देकर केस निबटा देंगे।"...समाजशास्त्री व सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक डॉ ए के वर्मा का कहना है कि-" पुलिस के प्रति भ्रष्टाचार के चलते जनता के मन में सम्मान का भाव नहीं है।"
बिहार सरकार के काफी समय तक गृह सचिव रहे श्री जियालाल आर्य ने एक बार निजी बातचीत में कहा था कि-" प्रशासन और सरकार अपने "इकबाल" से चलती है।"- उनकी इस टिप्पणी में गहरा राज छुपा हुआ था।
अगर इकबाल नहीं हो तो लाठी-गोली चला कर कोई भी सरकार क्या कभी "कानून का डर व राज" कायम कर सकती है?

ट्रैफिक चालान से भरा सरकार का खजाना



ट्रैफिक (Traffic) के नए कानून (New Law) से बिहार (Bihar) की नीतीश सरकार (Nitish Govt) की इनदिनों चांदी है. महज 13 दिन में चालान (Challan) से बिहार सरकार (Bihar Government) के खजाने में तकरीबन 50 लाख रुपये का राजस्व आया है. 50 लाख रुपये का यह राजस्व अकेले पटना (Patna) में ट्रैफिक (Traffic) की सख्ती और नए नियमों के चलते सरकार को मिला है. नए ट्रैफिक नियमों के चलते ड्राइविंग लाइसेंस (Driving license) बनवाने वालों में 10 गुना बढ़ोत्तरी हुई है.

सरकारी राजस्व में 10 गुना का इजाफा
पटना में ट्रैफिक के सख्त कानून ने आम आदमी की भले ही कमर तोड़ कर रख दी है, लेकिन पुलिस के ताबड़तोड़ चालान ने सरकारी राजस्व में इतना खजाना भर दिया है कि आप सुनकर हैरान हो जाएंगे. पटना के जिलाधिकारी कुमार रवि ने बताया कि महज 13 दिन में पटना जिला प्रशासन ने 50 लाख रुपये की वसूली की है. ये 50 लाख का आंकड़ा नए ट्रैफिक नियम लागू होने से पहले जिला प्रशासन पहले 3 महीने में पूरा करता था. यानी चालान की नई दर और नए कानून ने सरकारी खजाने की झोली भर दी है.

ड्राइविंग लाइसेंस और प्रदूषण जांच कराने वालों में 10 गुना बढ़ोत्तरी

सख्त कानून और सरकारी डंडे का कमाल, सरकार मालामाल
सरकारी आंकड़े के मुताबिक, पिछले 10 दिन में करीब सवा पांच हजार Motor Violation का मामला सामने आया है. शायद यह पहला मौका है जब इतने कम दिन में इतनी बड़ी जुर्माने की राशि सरकार और जिला प्रशासन ने लोगों से वसूली है. यह आंकड़ा अकेले बिहार की राजधानी पटना का है, अगर समूचे बिहार का आंकड़ा देखा जाएगा तो जुर्माने की राशि करोड़ों में पहुंची जाएगी.

Tuesday, September 3, 2019

सरदार पटेल भवन : दरक गया सीएम का सपना

  • पटना के जवाहर लाल नेहरू मार्ग पर सीएम नीतीश का ड्रीम प्रोजेक्ट हर किसी को आकर्षित करता है. सीएम नीतीश इस इमारत की कहानी अपने हर कार्यक्रम में कहते नहीं थकते, करोड़ों  की लागत से खड़ी ये इमारत पटना में बिहार पुलिस का मुख्यालय है, जहां सीएम साहब से लेकर पुलिस मुख्यालय,गृह विभाग से जुड़े दफ्तर है. लेकिन उदघाटन के कुछ ही महीने बाद सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट कैसे टूट कर बिखर रहा है....


  • जानकारी के मुताबिक़ सरदार पटेल भवन जिसे बिहार पुलिस मुख्यालय के रूप में हाल लोग जानने लगे है में अभी अभी एक बड़ी घटना हुई है जब एक कमरे की  फाल्स सीलिंग अचानक से गिर गई है. घटना सरदार पटेल भवन के ई ब्लॉक के तीसरे तल्ले पर स्थित फोटो ब्यूरो का लैब में हुई है. सीलिंग के अचानक गिरने से किसी को कोई चोट तो नहीं आई है लेकिन वहां रखे उपकरणों को भारी नुकसान पहुंचा है.फॉल्स सिलिंग के अचानक धराशायी होने के बाद कर्मी भी चौंचक्के रह गए।सरदार पटेल भवन पर एक नज़र 

बीते अक्तूबर महीने में बिहार के मुख्यमंत्री ने इस इमारत का उदघाटन किया था।करीब एक सौ साल बाद पुलिस विभाग को अपना मुख्लाय मिला था. करीब 305 करोड़ की लागत से बना यह सरदार पटेल भवन 53504 स्क्वॉयर मीटर में बना है. सात मंजिला यह भवन पूरी तरह से हाईटेक है. हर तरह की आपदा और माहौल में भी विधि व्यवस्था को नियंत्रण करने में सक्षम है. बिल्डिंग को 10 दिनों का पावर बैक-अप से लैस किया गया है. साथ ही वाटर ट्रीटमेट प्लांट से लैस ग्रीन बिल्डिंग है. यह बिल्डिंग 9 रियेक्टर स्केल तक के भूकंप के झटकों को भी आसानी से झेल सकेगा. पूरी बिल्डिंग को ग्रीन कंसेप्ट पर तैयार किया है. इसमें एक हेलीपैड से लेकर राज्य पुलिस का एक बेहद आधुनिक कमांड सेंटर भी होगा, जहां से पुलिस बल को किसी भी आपात स्थिति में राज्य में कहीं भी रवाना किया जा सकता है.  

महागठबंधन के ऑफर में कितना दम है?

बिहार-2020 से पहले नीतीश कुमार को फिर से बड़ा ऑफर मिला है. ये ऑफर महागठबंधन को लेकर आरजेडी की तरफ से है - और वो भी नेतृत्व करने के लिए. देखा जाये तो आम चुनाव से पहले महागठबंधन में शामिल होने को लेकर नीतीश कुमार खुद ही खूब कोशिश कर रहे थे. जेडीयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को लेकर उन दिनों मीडिया की सुर्खियां भी बनी थीं.
आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को महागठबंधन की अगुवाई करने का न्योता दिया है. सवाल ये है कि क्या मौजूदा हालात में नीतीश कुमार ये स्वीकार करेंगे?

एकबारगी तो आम चुनाव के बाद नीतीश कुमार को RJD की तरफ से मिले ऑफर का कोई मतलब नहीं है. बीजेपी के पक्ष में जो माहौल बना है, विरोधी दलों के लिए टकराना तो दूर उनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है. बगैर विपक्ष के लोक तंत्र का कोई मतलब तो होता नहीं, इसलिए स्कोप तो हमेशा बना रहेगा. ज्यादा कुछ न सही, सत्ता पक्ष को बुनियादी चीजें याद दिलाने की जिम्मेदारी भी तो विपक्ष की ही होती है.

राष्ट्रीय जनता दल के उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी का मानना है कि नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सकते हैं. लगे हाथ, शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को चेतावनी भी दे डाली है - अगर ऐसे समय की वो अनदेखी करते हैं तो इतिहास कभी उन्हें माफ नहीं करेगा.
नीतीश को ऑफर देने के साथ ही शिवानंद तिवारी ने बिहार की राजनीतिक स्थिति की एक साफ तस्वीर भी खींची है, बकौल आरजेडी नेता -
1. बिहार में महागठबंधन पूरी तरह बिखर गया है. शिवानंद तिवारी के हिसाब से इसकी बड़ी वजह आरजेडी में नेतृत्व की निष्क्रियता है.
2. शिवानंद तिवारी की राय में देश के मौजूदा हालात में नीतीश कुमार जैसे नेता को आगे आकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए.
3. आरजेडी नेता मानते हैं कि नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं, जो एनडीए में रहने के बावजूद धर्मनिरपेक्ष चेहरा हैं.
4. शिवानंद तिवारी का दावा है कि मौजूदा स्थिति में एक व्यवहारिक किस्म का गठबंधन हो सकता है और राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन की अहम भूमिका हो सकती है.
नीतीश कुमार के सामने ये मौका ऐसे दौर में आया है जब वो BJP के साथ 'कभी नरम तो कभी गरम' वाले खेल खेल रहे हैं. शिवानंद तिवारी की नजर में भले ही राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमार महत्वपूर्ण हो सकते हों, लेकिन फिलहाल तो उनके सामने आने वाली चुनौती बिहार विधानसभा का चुनाव है. समझने वाली बात ये है कि नीतीश कुमार अगर अभी NDA छोड़ कर महागठबंधन की तरफ जाने की सोचते हैं, तो क्या फायदा और नुकसान हो सकता है? अभी तो ऐसा लग रहा है कि महागठबंधन में गये बगैर ही नीतीश कुमार इस ऑफर का ज्यादा फायदा उठा सकते हैं. हालांकि, नीतीश कुमार को ये फायदा तभी मिल सकता है जब बीजेपी की नजर में नीतीश कुमार की अहमियत बनी रहे.
बेशक, भारी बहुमत के साथ आम चुनाव जीत कर आयी बीजेपी के पक्ष में एक जनमत नजर आ रहा है, खासकर जम्मू-कश्मीर से जुड़ी धारा 370 खत्म कर दिये जाने के बाद. निश्चित तौर पर बीजेपी ने अपने वोटर को मैसेज भेजा है कि जो चुनावी वादे वो करके सत्ता में लौटी है - पूरा भी करती है. लेकिन क्या बगैर नीतीश कुमार के बीजेपी बिहार में भी सरकार बना सकती है? तब भी जब शिवानंद तिवारी और आम चुनाव के नतीजों के हिसाब से महागठबंधन जीरो बैलेंस की स्थिति में आ चुका हो?
अभी तो मुश्किल है. अभी बिहार में बीजेपी का कोई भी नेता नीतीश कुमार जैसा तो नहीं ही बन पाया है - आगे की बात और है. यही वो सबसे अहम पहलू है जो बीजेपी नेतृत्व के सामने नीतीश कुमार का कद बढ़ा देता है. इसी कारण नीतीश कुमार बारगेन की पोजीशन में पहुंच जाते हैं. महागठबंधन के नाम पर नीतीश कुमार चाहें तो बीजेपी से विधानसभा सीटों के बंटवारे में सौदेबाजी की कोशिश कर सकते हैं. फिलहाल तो नीतीश कुमार के लिए महागठबंधन के ऑफर की इतनी ही अहमियत है.

 'दोनों हाथों में लड्डू' जैसा 'फील गुड'?

मोदी कैबिनेट 2.0 के गठन के वक्त नीतीश कुमार ने अपने मन मुताबिक न होने से दूरी बना ली थी, लेकिन कुछ ही दिन बाद जब बिहार मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो गठबंधन पार्टनर को ही झटका दे दिया. नीतीश कुमार के इस कदम को बीजेपी नेतृत्व - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को सख्त संदेश के दौर पर देखा गया.
जब संसद में तीन तलाक बिल आया तो रास्ते से हटकर जेडीयू ने सत्ताधारी बीजेपी की मदद कर दी - लेकिन धारा 370 का विरोध किया और बाद में पलट गये. एक जेडीयू नेता ने कुछ ऐसे समझाया कि जब कानून बन ही गया तो विरोध का क्या फायदा.
नीतीश कुमार ने एक बार फिर बीजेपी नेतृत्व को कड़ा तेवर दिखाया है. नीतीश कुमार ने 3C फॉर्मूला पेश किया है - Crime, Corruption and Communalism यानी अपराध, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता. सांप्रदायिकता ही वो मुद्दा है है जिसे लेकर नीतीश कुमार, बीजेपी के साथ एनडीए में रहते हुए भी दूरी बनाने की कोशिश करते हैं और खुद को अपनी शर्तों पर अलग दिखाने की कोशिश करते हैं.
ध्यान देने वाली बात ये है कि बिहार से पहले कुछ और विधानसभाओं के साथ झारखंड में भी चुनाव होने जा रहे हैं और नीतीश कुमार ने मैदान में अकेले उतरने का ऐलान कर दिया है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू झारखंड की सभी 81 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है. बीजेपी के लिए संदेश ये है कि गठबंधन सिर्फ बिहार में है, बाहर नहीं.
नीतीश कुमार ने लोक सभा चुनाव में तो सीटों की बराबरी पर समझौता कर लिया - क्या विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही होगा?
लोक सभा में कम ज्यादा होने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला था, लेकिन विधान सभा में इसका सीधा फायदा और नुकसान हो सकता है. अगर नीतीश कुमार ने कम सीटें जीती तो बीजेपी के विधायक कब नीतीश कुमार को हटाने की मांग करने लगें, कहा नहीं जा सकता. वैसे ही जैसे कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता झटकने में सिर्फ सवा साल लगे - क्या मालूम बिहार के लिए क्या प्लान बना रखा हो?
जैसा कि शिवानंद तिवारी बता रहे हैं कि बिहार में महागठबंधन मृतप्राय है. दरअसल, महागठबंधन ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था और वो पूरी तरह नाकाम रहे. चुनाव में हार के बाद भी तेजस्वी यादव की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आ रही है. चर्चा है कि तेजस्वी यादव तब तक सक्रिय भागीदारी से दूर रहना चाहते हैं जब तक पार्टी में मीसा भारती और तेज प्रताप यादव की दखल पर अंकुश लगने का आश्वासन नहीं मिलता.
वैसे बहुत कुछ बिहार चुनाव से पहले होने जा रहे विधान परिषद  चुनावों के नतीजे आने के बाद मालूम होगा. नतीजे ही बताएंगे कि नीतीश कुमार और बीजेपी दोनों ही आगे की रणनीति किस तरीके से तैयार करते हैं? अभी तो ऐसा ही लग रहा है जैसे नीतीश कुमार के दोनों हाथों में लड्डू आया हुआ है - और वो ज्यादा फायदे के हिसाब से फैसला कर सकते हैं.
बिहार में प्रचलित एक भोजपुरी कहावत है, 'दोनों हाथ में लड्डू और सिर कड़ाही में', ज्यादा लंबा न सही, मगर कुछ देर के लिए तो नीतीश कुमार ऐसा फील गुड कर ही सकते हैं.

बिहार में मुस्लिम नेताओं की मजबूरी


इन दिनों बिहार की राजनीति में इस बात पर सबसे ज़्यादा बहस होती है कि क्या बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी दलों के मुस्लिम नेताओं की पसंद के साथ मजबूरी बनते जा रहे हैं? दरअसल विपक्षी राजद और कांग्रेस के नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के कामकाज की तारीफ और फिर उनकी पार्टी में शामिल होने की होड़ लगी है. ऐसे में यह सवाल और भी ज्यादा पूछा जाने लगा है कि भले ही नीतीश कुमार बीजेपी के साथ सरकार चला रहे हैं लेकिन वे क्या बिहार की राजनीति में सक्रिय मुस्लिम नेताओं की पहली पसंद हैं?
इसका एक उदाहरण रविवार को देखने को मिला जब चार बार राजद से सांसद मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी ने जनता दल यूनाइटेड विधिवत रूप से ज्वाइन किया. उनसे पहले राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दिकी सदन के अंदर और बाहर बार-बार यह संदेश दे चुके हैं कि अब उन लोगों की राजनीति के तारणहार नीतीश ही हो सकते हैं.
अब राजनीतिक गलियारे में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद भी देर सबेर जनता दल यूनाइटेड का रुख कर लें तो आश्चर्य की बात नहीं होगी. कांग्रेस के विधायक शकील अहमद खान ने भी बार-बार संकेत दिया है कि बिहार में नीतीश कुमार से अच्छा कोई प्रशासक नहीं है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का अब कोई सवाल नहीं है. अधिकांश मुस्लिम नेताओं का मानना है कि अगर अगले विधानसभा चुनाव में राजद के साथ गठबंधन करके चुनाव मैदान में जाएंगे तो हार मिलना निश्चित है. लेकिन अगर नीतीश का साथ हो जाते हैं तो उन्हें कोई पराजित भी नहीं कर सकता.
मुस्लिम नेताओं का यह भी कहना है कि नीतीश भले ही बीजेपी के साथ हैं लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए उन्होंने अलग-अलग योजनाओं के अंतर्गत जो काम शुरू किए हैं उनका असर जमीन पर भी दिखता है. उसे नज़रअंदाज़ कर केवल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कब तक वोट मांगे जा सकते हैं.
इन नेताओं का मानना है कि जब तक नीतीश कुमार का नेतृत्व है तब तक बीजेपी एक सीमा से ज़्यादा अपने एजेंडा को लागू नहीं कर सकती. इसका उदाहरण पिछले साल रामनवमी के बाद तब देखने को मिला जब दंगा भड़काने के आरोप में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे को भी जेल की हवा खिलाने में नीतीश कुमार ने देर नहीं की.

अब 'कामचलाऊ' नेता बन गए हैं नीतीश कुमार?


क्या बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड अपने सुप्रीमो नीतीश कुमार को अब 'कामचलाऊ' और 'अस्थायी'  मानती है. ये सवाल पार्टी दफ़्तर के बाहर लगाए गये नए होर्डिंग के बाद लोग पूछ रहे हैं.  पटना में पार्टी दफ़्तर के बाहर नए होर्डिंग लगाए गए जिसमें नारा  था , ‘क्यूं करे विचार ठीके तो है नीतीश कुमार'.  निश्चित रूप से जिसने भी स्लोगन लिखा होगा उसमें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ख़ासकर नीतीश कुमार के क़रीबी आरसीपी सिंह के सहमति से  ही ये होर्डिंग लगायी होगी. लेकिन पार्टी के ही नेताओं को लगता है ये नारा लोगों को पच नहीं रहा. ठीके का मतलब बिहार की राजनीति और गांव घर में यही होता हैं कि वो बहुत अच्छे तो नहीं लेकिन ठीक ठाक कामचलाऊ हैं.

जहां पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान ‘बिहार में बहार हैं नीतीशे कुमार है' उसके बाद लोक सभा चुनाव के दौरान ‘ सच्चा है अच्छा है नीतीश के साथ चले ‘ जैसे नारे के साथ होर्डिंग पोस्टर लगाए गए थे. वहीं इस बार जो एक शब्द 'ठीके' है का प्रयोग किया गया है उससे तो यही साबित होता है कि नीतीश कुमार की पार्टी भी मानती है कि वो सर्वश्रेष्ठ या कुशल प्रशासक अब नहीं रहे बल्कि जो राजनीतिक माहौल है उसमें वह बस ठीक ही हैं .
अभी तक पार्टी का यही दावा था कि बिहार में नीतीश कुमार से बेहतर कोई मुख्यमंत्री नहीं हुआ उनसे अच्छा कोई कुशल प्रशासक नहीं है लेकिन जब पार्टी ही मान रही हो कि वो ठीके हैं तो तब क्या कहना. हालांकि जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता संजय सिंह का कहना हैं कि ये स्लोगन बारह करोड़ जनता की आकांक्षा का प्रतीक है. उन्होंने यह भी माना कि इस स्लोगन के पीछे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का कोई लेना देना नहीं हैं.  

01 Sep से होम और लोन में बदलाव



बैंक अकाउंट से नगद पैसा पर टीडीएस कटेगा
किसी भी सरकारी बैंक, पोस्ट ऑफिस से एक साल में 1 करोड़ से ज्यादा नगदी निकालने पर अब आपको 1 सितंबर से 2 फीसदी टीडीएस देना होगा. माना जा रहा है कि सरकार इसके पीछे डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना चाहती है.
होम और लोन में बदलाव 
अब आपके होम लोन और ऑटो लोन को रेपो रेट से लिंक किया जाएगा. इससे फायदा यह होगा कि आरबीआई जब भी रेपो रेट में कटौती करेगा इसका फायदा आपको मिलेगा. एसबीआई यह सेवा आज से शुरू कर देगा.
अब यहां देना होगा KYC
गूगल पे, पीटीएम या फोनपे जैसे मोबाइल वालेट का इस्तेमाल करने वालों को KYC भरना होगा. जिन लोगों ने 31 अगस्त इसे नहीं दिया है उनका वालेट आज से काम करना बंद कर देगा.  
FDI के रेट में कटौती
रिटेल डिपॉजिट पर अब ब्याज कम मिलेगा. एसबीआई ने इसमें कटौती की है. 1 लाख तक के डिपॉजिट वाले ग्राहकों को बचत खाते में 3.5 प्रतिशत ब्याज मिलता रहेगा. लेकिन एक लाख से ज्यादा डिपॉजिट वाले ग्राहकों के लिए यह दर 3 प्रतिशत ही रहेगी।
घर  खरीदने पर देना होगा ज्यादा टीडीएस
अब अगर आप खरीदते हैं तो साथ मिलने वाली सुविधाएं जैसे कार पार्किंग, विद्युत-पानी की सुविधा और क्लब मेंबरशिप जैसी अन्य सुविधाओं पर खर्च भी टीडीएस के दायरे में आएगा. 
आधार से नहीं लिंक है पैन तो
अगर अभी तक आपने आधार नंबर से अपना पैन लिंक नहीं कराया है तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट नया पैन जारी करेगा और अब आपका पुराना पैन कार्ड अवैध माना जाएगा.
15 दिन में जारी होगा किसान क्रेडिट कार्ड
अब 1 सितंबर से बैकों को किसान क्रेडिट कार्ड 15 दिन में जारी करना होगा.
3टिप्पणियां
यहां भी देना होगा 5 फीसदी का टीडीएस
अगर आपने एक साल के अंदर किसी कांट्रेक्टर्स या प्रोफेशनल को 50 लाख से अधिक का पेमेंट करते है तो उसमें 5 फीसदी का टीडीएस देना होगा.
LIC पर टीडीएस
अब आपको LIC से मिलने वाली राशि टैक्स के दायरे में आती है तो इस पर 5 फीसदी टीडीएस कटेगा.



ये हैं नए (Motor Vehicle Act) ट्रैफिक नियम

मोटर व्हीकल ऐक्ट 2019 01 sep से लागू हो गया है जिससे ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों को भारी जुर्माना भुगतना पड़ेगा. इस एक्ट को बीती महीने ही संसद से मंजूरी मिली है. इन नियमों का उद्देश्य लोगों में ट्रैफिक नियमों को तोड़ने का भय भरना है क्योंकि अभी तक जुर्माने की राशि बहुत कम होती थी जिसकी वजह से लोग 100-50 रुपये थमाकर ट्रैफिक के नियमों को तोड़ना अपनी शान समझते थे. अब कई शहरों में ट्रैफिक नियमों को तोड़ने वाले 'इंटलीजेंट ट्रैफिक सिस्टम' भी नजर रखेगा. नए नियमों के मुताबिक अब ड्राइविंग के दौरान मोबाइल से बात करना, ट्रैफिक जंप करना और गलत दिशा में ड्राइव करने को खतरनाक ड्राइविंग कैटेगिरी में रखा गया है और इस पर भारी जुर्माना देना पड़ेगा.

ये हैं नए (Motor Vehicle Act) ट्रैफिक नियम

  • नाबालिग के गाड़ी चलाने पर 25 हज़ार रुपये का जुर्माना
  • बिना हेलमेट के दुपहिया वाहन चलाने पर 500 से 1500 रुपये का जुर्माना, पहले ये 100 से 300 रुपये था.
  • दुपहिया वाहन पर तीन सवारी बैठाने पर जो जुर्माना पहले 100 रुपये था अब वो 500 रुपये हो गया है.
  • पॉल्यूशन सर्टिफ़िकेट न होने पर पहले 100 रुपये भरने पड़ते थे अब 500 रुपये देने होंगे.
  • बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चलाते पाए जाने पर अब 500 की जगह 5000 रुपये देने होंगे.
  •  ख़तरनाक ड्राइविंग करने पर अब एक हज़ार की बजाए 5 हज़ार रुपये देने होंगे.
  • ड्राइविंग के दौरान फ़ोन पर बात करने पर 1 हज़ार की जगह 5 हज़ार रुपये तक भरने पड़ेंगे.
  •  गलत दिशा में ड्राइविंग करने पर अब 1100 के बजाए 5 हज़ार रुपये तक देने होंगे.
  • रेड लाइट जंप करने पर पहले जो जुर्माना सिर्फ़ 100 रुपये था अब वो 10 हज़ार हो गया है.
  •  सीट बेल्ट लगाए बिना गाड़ी चलाने पर अब 1 हज़ार रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा.
  •  शराब पीकर गाड़ी चलाने पर जुर्माना अब 10 हज़ार हो गया है.
  • इमरजेंसी गाड़ियों जैसे एंबुलेंस और दमकल की गाड़ियों को साइड न देने पर 10 हज़ार रुपये का जुर्माना.

Wednesday, August 28, 2019

पटना हाईकोर्ट के इतिहास में पहली बार न्यायपालिका पर तल्‍ख टिप्‍पणी

पटना हाईकोर्ट के सीनियर जज राकेश कुमार ने जब बुधवार को पूर्व आईएएस केपी रमैय्या की खारिज अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई की तो उन्होंने न केवल राज्य सरकार के भ्रष्ट अधिकारियों की खिंचाई की, बल्कि उच्च न्यायपालिका तक को भी नहीं छोड़ा। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचारियों को न्यायपालिका से ही संरक्षण मिल जाता है, जिस कारण उसके हौसले बुलंद रहते हैं। पटना हाईकोर्ट के इतिहास में यह पहला न्यायिक आदेश है, जिसमें खुद न्यायपालिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया है। कोर्ट ने करीब दो घंटे में लिखाये गए आॅर्डर की प्रतिलिपि पीएमओ, कॉलेजियम, केन्द्रीय कानून मंत्रालय और सीबीआई के निदेशक को अग्रसारित करने का निर्देश दिया।    

बुधवार को बिहार महादलित विकास मिशन योजना में 5.55 करोड़ के घोटाले के आरोपी पूर्व आईएएस रमैय्या को निचली अदालत द्वारा जमानत दिए जाने पर कोर्ट ने कहा कि जिस एडीजे के खिलाफ  भ्रष्टाचार का मामला साबित हुआ, उसे बर्खास्तगी की जगह मामूली सजा मिली।
बताते चलें कि पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय खंडपीठ ने केपी रमैय्या को निचली अदालत में सरेंडर करने का निर्देश दिया था। नियमत: विजिलेंस से जुड़े होने के कारण विजिलेंस जज मधुकर कुमार की अदालत में जमानत पर सुनवाई होनी चाहिए थी। वे एक दिन की छुट्टी पर थे और उनकी जगह पर प्रभारी न्यायिक पदाधिकारी विपुल कुमार सिन्हा को चार्ज सौंपा गया था। उसी दिन रमैय्या ने बेल-कम-सरेंडर याचिका दायर कर बड़ी आसानी से जमानत ले ली थी। 
न्यायाधीश कुमार ने कहा कि यह बाद में पता चला कि मुख्य न्यायाधीश के आगे-पीछे हाईकोर्ट के सीनियर जज तक लगे रहते हैं, ताकि उनका भ्रष्टाचार भी छिप जाए। उन्होंने ने कहा कि जब हमने न्यायाधीश पद की शपथ ली थी, तब से देख रहा हूं कि सीनियर जज भी मुख्य न्यायाधीश को मस्का लगाने में मशगूल रहते हैं, ताकि उनसे कोई फेवर लिया जा सके और भ्रष्टाचारियों को भी संरक्षण मिलता रहे।
एकलपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के लिए बेली रोड, सर्कुलर रोड एवं अणे मार्ग में बंगले आवंटित किये जाते हैं, लेकिन इसके साज-सच्जा में करोडों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं। जबकि यह टैक्स पेयर की ही दी हुई राशि होती है।
गौरतलब है कि राकेश कुमार हाईकोर्ट के वरीय न्यायाधीश हैं और वे हाईकोर्ट प्रशासन के महत्वपूर्ण अंग भी हैं। उन्‍होंने सवाल किया केपी रमैय्या की सुप्रीम कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद भी उनको किस परिस्थिति में उन्हें नियमित जमानत दे दी गई? कोर्ट ने कहा कि जिला जज इस पूरे प्रकरण की जांच करें और तीन सप्ताह के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करें। 
क्‍या कहा जज ने
हाईकोर्ट के न्यायाधीश को बंगला आवंटित होते ही रख-रखाव और साज-सज्‍जा पर लाखों रुपये खर्च किये जाते हैं। एक जज ने तो अपने बंगले के रख-रखाव और सौंदर्यीकरण में एक करोड़ से भी ज्यादा रुपये खर्च करवा दिए,जबकि यह राशि गरीब जनता की गाढ़ी कमाई की है।
- जस्टिस राकेश कुमार 
पटना जिला अदालत में रिश्वतखोरी के स्टिंग ऑपरेशन की सीबीआई जांच
हाईकोर्ट की इसी पीठ ने पटना जिला न्यायालय में हुए रिश्वतखोरी के मामले में सीबीआई को जांच का आदेश दे दिया है। सीबी आई को तीन सप्ताह के अंदर जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है। मालूम हो कि एक निजी चैनल द्वारा 17 अधिकारियों के खिलाफ  स्टिंग ऑपरेशन किया गया था, जिसमें यह दिखाया गया था कि किस प्रकार से ये अधिकारी अभियुक्तों की मदद करते हैं। इस प्रकरण में किसी भी कर्मचारी एवं अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई। इस पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका से जुड़े लोगों को भी नहीं बख्शा जाना चाहिए। पटना हाईकोर्ट के इतिहास में यह पहला न्यायिक आदेश है जिसमें खुद न्यायपालिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया है। कोर्ट ने करीब दो घंटे में लिखाये गए आॅर्डर की प्रतिलिपि पीएमओ, कॉलेजियम, केन्द्रीय कानून मंत्रालय और सीबीआई के निदेशक को अग्रसारित करने का निर्देश दिया।