Saturday, April 19, 2014

पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश पाकिस्तान


पाकिस्तान के जाने माने पत्रकार हामिद मीर पर 19 अप्रैल, 2014 को आईएसआई की पर जानलेवा हमला किया गया। दो मोटरसाइकिल पर सवार चार हमलावरों ने मीर की कार पर अंधाधुंध फायरिंग उस समय की जब मीर हवाई अड्डा से अपने कार्यालय की ओर जा रहे थे। मीर को तीन गोलियां लगने के बाद नाजुक स्थिति में कराची के स्थानीय अस्पताल में भर्ती किया गया है। विश्व पत्रकार संगठन रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स’ के मुताबिक जनवरी 2012 से लेकर अब तक पाकिस्तान में 18 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। 2012-2013 के लिए प्रेस आजादी इंडेक्स के मुताबिक अंदरूनी मुश्किलों की वजह से पाकिस्तान दुनिया में पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश है।
मालूम हो कि विगत 25 नवम्बर, 2012 को भी हामिद मीर पर कातिलाना हमला हुआ था लेकिन तब उनकी जान बच गई थी। तब हामिद मीर जियो टेलिविजन में कैपिटल टॉक शो के मेजबान थे और कुछ दिनों से तालिबान के निशाने पर थे। पुलिस ने इस्लामाबाद में मीर की गाड़ी के नीचे से एक बम को निष्क्रिय किया था। इसके थोड़े दिन पहले ही लड़कियों की शिक्षा की पैरवी करने वाली मलाला युसुफजई पर तालिबान के हमले का मुद्दा मीर ने अपने शो पर उठाया था। उस वक्त पाक पुलिस का कहना था कि बम उनकी गाड़ी की आगे वाली सीट के नीचे लगाया गया था। एक डिटोनेटर सहित आधा किलो विस्फोटक पदार्थ गाड़ी के नीचे लगाया गया था। मीर अपने दफ्तर जा रहे थे और माना जा रहा था कि बम तब लगाया गया जब वह कुछ देर के लिए बाजार में रुके थे।
तब मीर ने जियो चैनल से बातचीत में कहा कि यह हमला उनके और पाकिस्तान में पत्रकार समुदाय के लिए एक संदेश है। वे चाहते हैं कि हम सच बोलने से रुकें लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूं कि हमें कोई रोक नहीं सकता। मीर के मुताबिक पाकिस्तान के आंतरिक मंत्रालय ने पहले ही उन्हें अपनी जिंदगी को खतरे के बारे में जानकारी दी थी लेकिन वह किसी भी गुट को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहते। पिछले महीने पाकिस्तान में खुफिया अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें तालिबान की पत्रकारों पर निशाना साधने की योजना के बारे में पता चला है। इस घटना से कुछ हफ्तों पहले तालिबान ने पाकिस्तान की पश्चिमोत्तर स्वात घाटी में मलाला युसुफजई नाम की लड़की पर हमला किया था क्योंकि वह लड़कियों के लिए शिक्षा के अधिकारों पर खुले आम बोल रही थी।
मई 2011 में पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शहजाद भी मारे गए थे। वे अल कायदा और पाकिस्तान सेना के बीच संपर्क पर लिख रहे थे। शहजाद ने अपनी मौत से पहले ह्यूमन राइट्स वॉच से कहा था कि खुफिया अधिकारियों ने उन्हें धमकी दी थी। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने शहजाद की मौत में हाथ होने से इनकार किया था मगर उसकी सफाई पर किसी को विश्वास नहीं हुआ।


Thursday, April 17, 2014

सोशल मीडिया और लोकसभा चुनाव


चर्चा हो रही है कि 2014 का लोकसभा चुनाव सोशल मीडिया के माध्यम से लड़ा जा रहा है। क्या सचमुच सोशल मीडिया और उस पर सक्रिय वर्चुअल मिडिल क्लास भारतीय राजनीति की दिशा तय कर रहा है? भारतीय राजनीति के कुछ पहलुओं पर गौर करने पर साफ पता चलता है कि देश की राजनीति अचानक कुछ बदलावों के साथ नये रूप में सामने रही है। उसके इस नयेपन पर सर्वाधिक प्रभाव सोशल मीडिया का है। फिर भी यह सवाल मौजूद है कि क्या सोशल मीडिया देश की राजनीतिक इबारत लिखने का दमखम रखता है। राजनीतिक दांव-पेंच और उनकी उलझनें इतनी सुलझ गई हैं कि पिछले 10 साल से अस्तित्व में आया सोशल मीडिया और उस पर सक्रिय वर्चुअल मिडिल क्लास भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा? क्या वैचारिक तौर पर यह माध्यम इतना परिपक्व और सशक्त हो चुका है?

कुछ दिनों पहले आईआरआईएस नॉलेज फाउंडेशन, इंटरनेट एवं मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 543 लोकसभा सीटों में से 160 सीटों के नतीजों को सोशल मीडिया प्रभावित कर सकता है। सोशल मीडिया के प्रभाव में आने वाले ये ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां कुल मतदाताओं की संख्या के दस फीसदी फेसबुक यूजर्स हैं, साथ ही जहां फेसबुक यूजर्स की संख्या पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवारों की जीत के अंतर से अधिक हैं. इस अनुमान के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में सबसे अधिक 21, गुजरात में 17, उत्तर प्रदेश की 14, कर्नाटक की 12, मध्यप्रदेश में 9 और दिल्ली की सभी 7 सीटें सोशल मीडिया के उच्च प्रभाव में हैं. हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की पांच-पांच सीटें, जबकि बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, झारखंड और पश्चिम बंगाल की चार सीटों के नतीजे सोशल मीडिया द्वारा प्रभावित हो सकते हैं। अध्ययन में 67 निर्वाचन क्षेत्रों को मध्यम प्रभाव, 60 निर्वाचन क्षेत्रों को कम प्रभाव और 256 निर्वाचन क्षेत्रों को प्रभावहीन घोषित किया गया है।

मेरा मानना है कि तमाम सवालों के बावजूद सोशल मीडिया के असर को एकदम से नाकारा भी नहीं जा सकता है। आकंडों पर गौर करें, तो पिछले 10 वर्षों में शहरी आबादी कुल आबादी का लगभग 32 फीसद है, इनमें 52 फीसद मिडिल क्लास है और पूरे विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाली मिडिल क्लास की आबादी चीन के बाद भारत में ही है। युवा आबादी सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय है और देश में 35 फीसद आबादी 25 साल से कम उम्र के युवाओं की है। जनगणना 2011 से मिले आंकड़ों पर गौर करें, तो 2001 से 2011 के बीच देश में 2875 नये शहर बने। शहरी आबादी बढ़ी, आधुनिक टेक्नोलॉजी और संचार की सुविधाएं बढ़ीं, गांवों की सीटें शहरी सीटों में तब्दील हो गईं। आज देश में लगभग 25 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह आंकड़े बेहद उत्साहित करने वाले हैं, लेकिन यह सवाल तो अब भी शेष ही है कि सोशल मीडिया के मंचों पर जन्म ले रहा वर्चुअल मीडिल क्लास, क्या केवल अपने अधिकारों की लड़ाई को लेकर ही आवाज उठाने में विश्वास रखता है या उसकी राजनीतिक चेतना भी उतनी ही विकसित हुई है.....

Monday, April 14, 2014

सवाल मीडिया के इरादे का …(2) ---------बस बोली लगाने की देरी है----------


भारतीय पत्रकारिता आज असामान्य दौर से गुजर रही है। पत्रकारिता सिर्फ सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का जरिया नहीं रह गई है। अब सूचना और संवाद का व्यापार होने लगा है। पत्रकारिता के जरिये सरकारों का गठन, उत्थान और पतन हो रहा है। एक छोटी-सी अखबारी सूचना से समाज में तनाव, विवाद और संघर्ष पैदा हो रहे हैं। इलेक्ट्रानिक माध्यमों के ब्रेकिंग न्यूज से ऐसा अनेक झड़पों के पैदा होने की संभावना बनी रहती है। समस्याओं के दौरान मीडिया कवरेज न सिर्फ जोखिम भरा होता है बल्कि जोखिम पैदा करने वाला भी होता है। चुनावों के दरम्यान प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माध्यमों में स्थान और समय खरीदने का चलन हो गया है। दल और नेता प्रायोजित सर्वे करवाते हैं। बाद में इसे प्रकाशित और प्रसारित किया जाता है। खबरों में विज्ञापन और विज्ञापने में खबरों का चलन शुरू हो चुका है।
मीडिया और राजनीति का चोली-दामन का संबंध है। एक-दूसरे के बिना इनका काम नहीं चल सकता है। राजनीतिक रिपोर्टिंग करने वालों को लोभ, लालच और भय का सामना भी करना पड़ता है। न सिर्फ कारपोरेट घरानों ने बल्कि नौकरशाही और राजशाही ने भी मीडिया में दलालों और बिचैलियों की एक बड़ी फौज तैयार कर रखी है। जिला स्तरीय प्रतिनिधि से लेकर संवाददाता, डेस्क इंचार्ज और संपादक स्तर तक अपना जाल फैला रखा है। पत्रकारिता के नामचीन हस्तियों को कटघरे में देख ऐसा लगता है कि पत्रकारों की एक बड़ी जमात कारपोरेट और राजनैतिक हाथों में या तो बिक चुकी है, या फिर खुद को बेचने के लिए तैयार खड़ी हैं। बस खरीददार और बोली लगाने की देरी है……