Saturday, December 31, 2011

उत्तर प्रदेश में परिसीमन से बढ़ी प्रत्याशियों की परेशानी

परिसीमन के बाद हो रहे पहले विधानसभा चुनाव के चलते उत्तर प्रदेश की कई पार्टियों के दिग्गजों की सियासी कर्मभूमि बदल गई है। जिससे इस बार उन्हें दूसरे निर्वाचन क्षेत्रों की ओर रुख करना पड़ा है। परिसीमन की वजह से विधान सभा क्षेत्रों के भूगोल में हुए बदलाव से सभी दलों की परेशानियां बढ़ गयी हैं। कई निवर्तमान विधायकों को जहां अपनी पुरानी सीटों को छोड़कर किसी नये क्षेत्र की शरण में जाना पड़ा है वहीं कई की सीट ही समाप्त हो गयी हैं। इसके साथ नवसृजित विधान सभा सीटों में वोटों के समीकरणों में भी भारी उलटफेर हुआ है। वोटों के जातीय समीकरण बदलने से भी प्रत्याशियों की परेशानी बढ़ी हुई है।
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही अब तक देवरिया की कसया सीट से अपनी किस्मत आजमाते रहे हैं लेकिन नए परिसीमन में उनके पुराने निर्वाचन क्षेत्र का वजूद ही समाप्त हो गया है। भाजपा ने शाही को जिले की नई सीट पथरदेवा से मैदान में उतारा है। नई सीट पर नए जातीय समीकरण ने शाही की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ठीक इसी प्रकार कांग्रेस के दिग्गज नेता अम्मार रिजवी परम्परागत रूप से सीतापुर की महमूदाबाद सीट के बजाय नई विधानसभा सीट सेवता से ताल ठोंक रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर चार बार विधानसभा और एक बार विधान परिषद का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। परिसीमन में उनकी आजमगढ़ की लालगंज सीट सुरक्षित हो गई है। वह अपने लिए नया ठिकाना ढूंढ रहे हैं। दीदारगंज सीट से उनके चुनाव लडऩे की सम्भावना जताई जा रही है।

कुछ ऐसा ही हाल पांच बार विधायक और तीन बार सांसद रहे मित्रसेन यादव का है। फैजाबाद की मिल्कीपुर सीट से उन्होंने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। वह इस सीट से पहली बार विधायक चुने गए थे। विधानसभा के लिए हमेशा वह इसी सीट से लड़े। वह दो बार इस सीट से हारे भी लेकिन सीट नहीं बदली। पर इस बार उनको मिल्कीपुर को अलविदा कहना पड़ गया क्योंकि यह सीट आरक्षित हो गई है। मजबूरन उन्हें बीकापुर सीट का रुख करना पड़ा है।
बसपा के कई मंत्रियों को भी परिसीमन की वजह से अपना इलाका बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। संसदीय कार्य, वित्त, चिकित्सा, शिक्षा आदि महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे लालजी वर्मा अम्बेडकरनगर की टांडा सीट से चुने जाते रहे हैं लेकिन पांचवी बार विधानसभा में पहुंचने के लिए उन्हें नई सीट की दरकार है। परिसीमन में उनकी सीट भी बदल गई है।
ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय हाथरस से चुनाव लड़ते रहे हैं लेकिन इस बार परिसीमन में उनकी सीट सुरक्षित हो गई है, इसलिए वह नया ठिकाना तलाश रहे हैं। गोरखपुर की पनियारा विधानसभा सीट वन मंत्री फतेहबहादुर सिंह की परम्परागत सीट रही है। यहां से उनके पिता स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह भी चुनाव लड़ते थे। परिसीमन में पनियारा विधानसभा सीट का भूगोल बदल जाने के कारण अब वह कैम्पियरगंज से चुनाव लडऩे को तैयार हैं। नगर विकास मत्री नकुल दुबे की महोना विधानसभा सीट का परिसीमन में वजूद समाप्त हो गया है इसलिए वह इस बार बक्शी का तालाब से किस्मत आजमाएंगे।
इन प्रमुख मंत्रियों के अलावा समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अशोक वाजपेयी अब पिहानी सीट की बजाय हरदोई की सवायजपुर सीट से, विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक अम्बिका चौधरी कोपाचीट के स्थान पर फेफना से और प्रदेश के महासचिव एवं पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह दिलदारनगर की बजाय अब जमानिया सीट से अपनी किस्मत आजमाएंगे।

प्रदेश अध्यक्षों की भी होगी अग्निपरीक्षा


सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के साथ-साथ उनके प्रदेश अध्यक्षों की भी अग्निपरीक्षा होगी। उनके सामने अपने दल को बढ़त दिलाने और दलीय प्रत्याशियों की जीत के लिए चुनाव प्रचार करने के साथ-साथ खुद का चुनावी मैदान जीतने की भी चुनौती है।
पिछले कुछ सालों की राजनीति में यह पहला मौका है जब समाजवादी पार्टी को छोड़ कर अन्य सभी राजनीतिक दलों के प्रदेश अध्यक्ष चुनाव मैदान में ताल ठोकेंगे। विधानसभा चुनाव में केवल उनके दल की ही नहीं बल्कि उनकी लोकप्रियता की भी मतदाताओं की कसौटी पर परीक्षा होगी। दल को अगर चुनावी कामयाबी मिलती है तो पार्टी पर उनकी पकड़ और मजबूत होगी,वरना चुनाव बाद उन्हें अपने ही दल में विरोध का सामना करना भी पड़ सकता है।
कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी जहां लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ रही हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही देवरिया की पथरदेवा सीट से इस बार अपनी किस्मत अजमा रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी  के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य कुशीनगर की पडरौना सीट से व राष्ट्रीय लोक दल के प्रदेश अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह आगरा की एत्मादपुर सीट से जबकि पीस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल मन्नान बलरामपुर की उतरौला सीट से चुनावी मैदान में होंगे।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वह कन्नौज से सांसद हैं। सपा पदाधिकारियों का कहना है कि वह विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों को जीत दिलाकर सपा की सरकार बनाने के महत्वाकांक्षी अभियान में लगे हैं। वह भले ही खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं मगर अपने प्रत्याशियों को जीताने की गुरुत्तर जिम्मेवारी उनके कंधों पर हैं। दूसरी ओर बिहार में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में स्थापित जनता दल युनाइटेड की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष सुरेश निरंजन भैया का बुंदेलखंड की किसी सीट से और इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कालीचरण सोनकर का इलाहाबाद जनपद की किसी सीट से चुनाव लडऩा लगभग तय बताया जा रहा है।
राजनीतिक दलों के प्रदेश अध्यक्षों ने चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद जहां अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में अपनी धमक बढ़ा दी वहीं सूबे के अलग-अलग क्षेत्रों में अपने दलीय प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया है। सात चरणों मेंं होने वाले चुनाव के मद्ïदेनजर कमोबेश सभी दलों के प्रदेश अध्यक्षों ने अपने-अपने क्षेत्रों के साथ ही अन्य क्षेत्रोंं के लिए भी अपने कार्यक्रम को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया हैं। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्षों को अपने राष्टï्रीय नेताओं के कार्यक्रमों और चुनावी सभाओं की सफलता की जिम्मेवारी का भी निर्वाह करना पड़ेगा। बड़े दलों के प्रदेश अध्यक्षों को थोड़ी सहुलियत भी है कि उनके यहां स्टार प्रचारकों की भरमार है, मगर छोटे दलों की दुशवारियां कुछ अलग तरह की है।
ऐसे मेंं यह माना जा रहा है कि सभी दलों केप्रदेश अध्यक्षों को दोहरी जिम्मेवारी का निर्वाह करना पड़ेगा। एक ओर जहां उन्हें अपने क्षेत्र के मतदाताओं को समय देना होगा वहीं पूरे प्रदेश के चुनाव पर भी उन्हें नजर रखनी होगी।

Wednesday, December 28, 2011

पश्चिम में बसपा पस्त,सपा मस्त

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समूचे रूहेलखंड में इस बार बसपा की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। राज्य विधानसभा चुनाव के पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रूहेलखंड की 60 सीटों पर आगामी चार फरवरी को मतदान होगा। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में अव्वल रही सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी और नम्बर दो पर रही समाजवादी पार्टी ने आगामी चुनाव के लिये बाकायदा प्रचार और जनसंपर्क शुरू कर दिया है जबकि भारतीय जनता पार्टी,जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस-राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन ने भी कमर कस ली है। बसपा जो पिछले चुनाव में इस क्षेत्र में अव्वल रही थी,इस बार उसके लिए स्थितियां यहां काफी बदल गयी है। परिसीमन की वजह से क्षेत्रों के नये स्वरूप के साथ ही कांग्रेस-रालोद के गठबंधन की वजह से भी वोटों के समीकरण बदले हैं। सपा की सक्रियता और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के अभियान की वजह से वोट बैंकों के नए सिरे से बनने-बिगडऩे की संभावना व्यक्त की जा रही है। बदले चुनावी समीकरण की वजह से कई सीटों पर जहां मुकाबले रोचक होने का अनुमान है वहीं चुनाव परिणाम भी पिछले चुनाव से अलग होने की संभावना जतायी जा रही है। माना जा रहा है कि पिछले चुनाव में रूहेलखंड से 27 सीटें जीतने वाली बसपा की राह आसान नहीं है और उसको इस बार खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं सपा के हौसलें बुलंद हैं।
बसपा और सपा ने राज्य विधानसभा के आगामी चुनाव के पहले चरण की अधिसंख्य सीटों के लिये अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिये हैं। घोषित प्रत्याशी ऊहापोह और टिकट रहने-कटने की तमाम आशंकाओं के बावजूद अपनी सक्रियता बरकरार रखे हुए हैं। वहीं दूसरी ओर भाजपा को 32 और कांग्रेस-रालोद गठबंधन को 30 सीटों पर अभी अपनी उम्मीदवारी तय करनी है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की धमाचौकड़ी क्षेत्र में जरूर शुरू है,मगर सपा, बसपा की तुलना में उनका चुनाव प्रचार अभियान जोर नहीं पकड़ पाया है। प्रदेश की अन्य क्षेत्रीय और छोटी पार्टियां भी इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बेताब है। उनके नेताओं और प्रत्याशियों की बैठकें और प्रचार अभियान भी जारी है। कई क्षेत्रीय दल मजबूत और दमखम वाले प्रत्याशियों की तलाश में जुटे हैं ताकि मैदान में उनकी उपस्थिति दर्ज हो।
वर्ष 2007 के चुनाव में इन नौ जिलों में से मुरादाबाद मंडल के बिजनौर जिले के तहत आने वाली सभी सात सीटों पर बसपा ने जीत हासिल की थी। केन्द्रीय मंत्री चौधरी अजित ङ्क्षसह की अगुवाई वाले राष्ट्रीय लोकदल को तब इन नौ जिलों में एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार भले ही वे कांग्रेस से गलबहिया कर चुनाव मैदान में उतरे हैं, मगर उनके दल के पक्ष में क्षेत्र में कोई माहौल बनता नहीं दिख रहा है। इस बार भी रालोद इन क्षेत्रों में सिफर ही रहे तो कोई आश्चर्य नहीं। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के अभियान के बावजूद पश्चिमी प्रदेश के इन इलाकों में कांग्रेस की हवा बनती नहीं दिख रही है। पिछड़ों और मुसलमानों के गठजोड़ से सपा के हौसले इस बार इन क्षेत्रों में बुलंद दिख रहे हैं। भाजपा प्रत्याशियों को लेकर बनी असमंजस की स्थिति से भाजपा को नुकसान हो रहा है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण में बरेली और  मुरादाबाद मंडलों तथा लखनऊ  मंडल के लखीमपुर खीरी जिले की 26-26 एवं लखनऊ  मंडल के लखीमपुर खीरी जिले की आठ सीटों के लिए मतदान होगा। नये परिसीमन से पहले वर्ष 2007 में हुये उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बरेली मंडल के तहत आने वाले बदायूं, शाहजहांपुर, बरेली और पीलीभीत तथा मुरादाबाद मंडल के तहत आने वाले रामपुर,मुरादाबाद, जे.पी.नगर और बिजनौर जिले तथा लखनउ मंडल के लखीमपुर खीरी समेत नौ जिलों में राज्य विधानसभा की 57 सीटें थीं, इनमें से बसपा को 27, सपा को 17, भाजपा  को 09, डी.पी.यादव के राष्ट्रीय परिवर्तन दल को दो तथा कांग्रेस एवं अन्य को एक एक सीट मिली थी। नए परिसीमन के बाद बिजनौर,जेपीनगर,रामपुर और लखीमपुर में एक-एक सीट बढ़ी है जबकि दूसरी ओर शाहजहांपुर में एक सीट कम हुई है।

Monday, December 26, 2011

पूर्वांचल में होगी बसपा की असली अग्निपरीक्षा

चुनाव की घोषणा के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक तापमान चढऩे लगा है। आंकड़ों के लिहाज से पूर्वी उत्तर प्रदेश का पिछला चुनाव परिणाम बसपा में पक्षा में था। यहां की कुल 177 सीटों में से 97 सीटों पर बसपा ने तब कब्जा जमाया था। हाल की राजनीतिक स्थितियों और बनते-बिगड़ते चुनावी समीकरणों में अगर बसपा अपनी विगत की स्थिति को बरकरार नहीं रखती है तो सबसे ज्यादा नुकसान भी उसे पूर्वांचल में ही उठाना पड़ सकता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पूर्वांचल में ही इस बार बसपा की कड़ी अग्निपरीक्षा होने वाली है।
राज्य बंटवारे का दांव चल कर बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस क्षेत्र की दीर्घ लम्बित मांग को हवा देने की कोशिश जरूर की मगर इस चुनाव में उन्हें इसका कितना लाभ मिल पायेगा, यह कहना अभी कठिन है। मुख्यमंत्री मायावती द्वारा पूर्वांचल सहित चार अलग राज्य बनाने और उत्तर प्रदेश के विभाजन का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा गया था। केन्द्र सरकार ने प्रस्ताव पर कुछ सवाल उठाये हैं मगर इस प्रस्ताव से पैदा हुयी राजनीतिक आग की आंच से सभी राजनीतिक दल प्रभावित हैं। लोकमंच के नेता तो इसे अपनी आरम्भिक जीत बता कर श्रेय लेने की होड़ में जुट गए हैं और उनकी योजना है कि विधान सभा चुनाव में पूर्वांचल विरोधियों की करारी पराजय हो। अमर ङ्क्षसह ने इस मुद्दे को पूर्वांचल के विकास से जोड़ कर यह कहना शुरू कर दिया है कि बिजली पूर्वी उत्तर प्रदेश पैदा करे और रोशनी बादलपुर और सैफई में हो। पूर्वांचल की उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं की जायेगी।
उल्लेखनीय है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के सिध्दार्थनगर जिले के इटावा विधान सभा के कांग्रेसी विधायक ईश्वर चन्द शुक्ला ने सबसे पहले पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव विधान सभा में बहस के लिए पेश किया था मगर कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा राज्य सरकार के उत्तर प्रदेश विभाजन के प्रस्ताव को लौटा देने के बाद कांग्रेस के हाथ से यह मुद्ïदा निकल गया। वैसे कांग्रेस फिलवक्त इस मुद्ïदे न तो विरोध और न समर्थन की रणनीति अख्तियार की हुई है। बसपा सुप्रीमो इस मुद्ïदे को इस चुनाव में पूरी तरह कैश करना चाहती थीं मगर केन्द्र के रवैये से उनकी मंशा पूरी होती नहीं दिख रही है। इस अंचल के छोटे राजनीतिक दल पीस पार्टी,उलेमा कौंसिल और अमर ङ्क्षसह के नेतृत्व वाली लोकमंच के अलावा भारत समाज पार्टी जैसे दलों की ओर से पूर्वांचल के विकास और वर्तमान सरकार में होती रही उपेक्षा को मुद्ïदा बना कर उछालने से बड़े दलों के समक्ष परेशानी पैदा हो सकती है।
यदि वर्ष 2007 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव को आधार बनाया जाय तो पूर्वांचल की 177 सीटों में से बसपा को 97 सीटे मिली थी यानि बसपा को पूरे प्रदेश से मिली कुल 206 सीटों में 47 प्रतिशत हिस्सेदारी पूर्वांचल की थी। पूर्वांचलवासियों के बीच एक चर्चा यह भी है कि पूर्वांचल से मिली इतनी बड़ी सफलता के बावजूद बसपा सुप्रीमो यहां के विकास को लेकर उदासीन बनी रहीं और एक तरह से यहां के लोग उपेक्षित ही रहे।
यह भी दीगर है कि वर्तमान चुनाव में बसपा अपनी 97 सीट में से एक भी सीट खोना नहीं चाहेगी। वर्ष 2007 के चुनाव में पूर्वांचल में  सपा 44, भाजपा 19 और कांग्रेस को मात्र सात सीटें प्राप्त हुई थीं। इस तरह बसपा अगर पूर्वांचलवासियों को अपने पक्ष में करने में सफल नहीं हो पाती है तो सर्वाधिक नुकसान भी उसे ही उठाना पड़ेगा।
वर्ष 2002 के चुनाव में भी बसपा को इतनी कामयाबी नहीं मिली थीं जितनी इस क्षेत्र में वर्ष 2007 में मिली।       उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव वर्ष 2002 में बसपा को कुल 98 सीटें ही मिली थी और सपा को 143 सीटें मिली थी जबकि भाजपा को 88 और कांग्रेस को कुल 25 सीटें मिली थीं। पूर्वांचल के मुद्दे पर इस अंचल की 177 सीटों पर आरम्भिक रूप से बसपा को ज्यादा जूझना होगा। यह अलग बात है कि यह पहला अवसर है जब सत्ता में रहते हुए बसपा चुनाव मैदान में होगी और उसे सत्ता विरोधी लहर का सामना करना होगा। इसके साथ ही सर्वाधिक विधायक जीता कर देने वाले पूर्वांचल की उपेक्षा और विकासहीनता के सवाल भी होंगे।

Friday, December 23, 2011

मुसलमानों के साथ छल कर रही हैं मायावती

ऑल इंडिया मुस्लिम फोरम के संस्थापक व विधिवेत्ता डा. नेहालुद्दीन अहमद का मानना है कि पिछड़े मुसलमानों के आरक्षण को लेकर केन्द्र सरकार के साथ ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी छल कर रही हैं। उन्होंने  कहा कि कांग्रेस और बसपा प्रमुख मायावती की ओर से आगामी चुनाव के मद्ïदेनजर लाभ लेने के लिए पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने के नाम पर राजनीतिक बाजीगरी की जा रही है। इससे मुसलमानों को सचेत रहने की जरूरत है। भाजपा के संग बार-बार गठजोड़ करने वाली मायावती भरोसे लायक नहीं है। पिछड़े मुसलमानों की पीड़ा को सबसे पहले ऑल इंडिया मुस्लिम फोरम ने ही 1994 में उठाया था। तब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ही थीं। फोरम की मांग पर सहमति जताते हुए उन्होंने लखनऊ में हुई अपनी एक रैली में मुस्लिमों को आरक्षण देने की घोषणा भी कर दी। मगर बाद में अपनी ही घोषणा से भाजपा के दबाव पर पलटी मार गयी। तब फोरम ने मुख्यमंत्री मायावती के होर्डिंग और पोस्टरों को कालिख पोतना शुरू किया। फोरम के आंदोलन से घबड़ा कर मायावती ने दमनात्मक कार्रवाई शुरू की और उनके सहित फोरम के अन्य नेताओंं को गिरफï्तार करवा लिया। मगर बाद में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुस्लिम फोरम द्वारा सुझाये फार्मूला को स्वीकार किया और पिछड़े मुसलमानों के लिए आरक्षण लागू किया। उसके बाद प्रदेश में पिछड़े मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलने लगा,जिसे बाद में आबादी के आधार पर बढ़ा कर 8.44 फीसदी किया गया।

उन्होंने कहा कि उस समय उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी के आधार पर मुस्लिम फोरम की मांग थी कि पिछड़ों के लिए मंडल कमीशन के आधार पर निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण में से 8.44 प्रतिशत पिछड़े मुसलमानों के लिए तय किया जाए। इस मांग को लेकर 17 अक्तूबर 1994 को ऑल इंडिया मुस्लिम फोरम ने लखनऊ में एक कन्वेंशन का आयोजन भी किया था जिसमें उस समय के कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं मसलन पश्चिम बंगाल के मंत्री कलीमुद्ïदीन,पर्सनल लॉ बोर्ड के मुजाहिदुल इस्लाम कासमी,अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एम आर खुसरो तथा पत्रकार कुलदीप नैय्यर आदि ने भाग लिया। डा. नेहालुद्दीन के अनुसार तब वहां जुटे अधिसंख्य लोगों ने पिछड़े मुसलमानोंं के लिए आरक्षण का विरोध किया था। मगर बाद में 1997 में फोरम की इस मांग को पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने जहां अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल किया वहीं सीपीएम के अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने उत्तर प्रदेश में इसका समर्थन किया।
डा. नेहालुद्ïदीन ने कहा कि दक्षिण के कई राज्यों में पिछड़े मुसलमानों की आबादी के आधार पर अलग-अलग प्रतिशत में आरक्षण के प्रावधान किए गए है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और बिहार में भी नीतीश कुमार की सरकार ने कोटा विथ इन कोटा के तहत ही पांच प्रतिशत आरक्षण पिछड़े मुसलमानों को दिया गया है। इन राज्यों में पिछड़े मुसलमानों को इसका लाभ भी मिल रहा है।
फिलवक्त केन्द्र सरकार द्वारा पिछड़ों के लिए निर्धारित कोटा के अन्तर्गत ही अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान से संबंधित कैबिनेट से पास प्रस्ताव  को डा. नेहालुद्दीन ने मुस्लिमों के साथ धोखा बताया। उन्होंने कहा कि आगामी महीनों में देश के पांच राज्यों मेंं होने वाले विधान सभा चुनावों मेंं लाभ लेने की मंशा से की गयी यह कार्रवाई है। पिछड़े मुसलमानों के लिए आरक्षण की जगह अल्पसंख्यकोंं के लिए किए जा रहे इस प्रावधान से मुसलमानों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। मुसलमान एक बार फिर ठगे जा रहे हैं। ठीक इसी तरह पिछड़े मुसलमानों के लिए आरक्षण का कोटा बढ़ाने की मांग कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी चुनावी चाल चल रही हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यह संविधान संशोधन के बिना संभव नहीं है। ऐसी मांग कर वह एक बार फिर प्रदेश के मुसलमानों को भ्रमित करना चाह रही है। मगर मुसलमानों को सचेत रहने की जरूरत है। किसी झांसे में आने की जगह उन्हें आगामी चुनाव में अपने मतों का प्रयोग सोच समझ कर करना चाहिए,ताकि ऐसी सरकार यहां बने जो उनके हितों का ख्याल रखे।